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महारानी ने शिलामाता मंदिर में चढ़ाया था चांदी का पैर

जयपुर के तत्कालीन महाराजा मानसिंह द्वितीय को हवाई जहाज उड़ाने का चाव था। 1935 के उस दौर में उन्होंने खुद के लिए एक हवाई जहाज भी खरीद लिया था। 25 फरवरी, 1938 को मानसिंह ने पायलट एलएस हिल के साथ जयपुर से सवाई माधोपुर के लिए उड़ान भरी थी।

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जितेंद्र सिंह शेखावत

जयपुर के तत्कालीन महाराजा मानसिंह द्वितीय को हवाई जहाज उड़ाने का चाव था। 1935 के उस दौर में उन्होंने खुद के लिए एक हवाई जहाज भी खरीद लिया था। 25 फरवरी, 1938 को मानसिंह ने पायलट एलएस हिल के साथ जयपुर से सवाई माधोपुर के लिए उड़ान भरी थी। रास्ते में जहाज का इंजन खराब होने पर उनका प्लेन सूखी नदी में गिर गया। विमान दुर्घटना में मान सिंह घायल हो गए और विमान नष्ट हो गया था। हादसे में मान सिंह के शरीर की कई हड्डियां टूट गई थीं। इलाज के लिए उन्हें कार से जयपुर लाया गया।

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दुर्घटना में नष्ट हुए विमान की जगह पर्सीवल बेगा गुल नामक नया एयरक्राफ्ट खरीदा गया। इसके बाद जयपुर में तीन जहाज हो गए थे। एयर स्पीड एनवाय और पर्सीवल बेगा गुल जहाज को मान सिंह खुद उड़ाते थे। वहीं, टाइगर मोथ विमान को जयपुर फ्लाइंग क्लब को दिया था। वे जयपुर की जनता में बहुत लोकप्रिय थे। उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना से लोग भगवान से प्रार्थना करने लगे। सिटी पैलेस के अधिकारी रहे यदुवेन्द्र सहाय ने लिखा कि उनके पिता डॉ. दुर्गा सहाय मान सिंह के निजी चिकित्सक थे।

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मानसिंह की आमेर की शिला माता के प्रति गहरी आस्था रही। वे जयपुर से बाहर जाते और आते तब शिला माता का आशीर्वाद लेने आमेर जाते थे। लंबे समय तक ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, मुंबई और जयपुर में उनका इलाज हुआ। हालांकि, उनका एक पैर सही नहीं हुआ और चिकित्सक भी हार मान चुके थे। मानसिंह की महारानी मरुधर कंवर बहुत चिंतित रही। उन्होंने पति के स्वस्थ होने की कामना से मानसिंह के पैर के आकार का एक चांदी का पैर भी आमेर में शिलादेवी को चढ़ाया और अनुष्ठान करवाए थे। उपचार के बाद हल्की लचक के साथ मानसिंह चलने लगे और रामबाग में पोलो भी खेलने लगे। वर्ष 1957 में मानसिंह की पोलो टीम ने विश्व कप जीत कर दुनिया में तहलका भी मचा दिया।

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