
जयपुर।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को हर साल की तरह 2 अक्टूबर को उनकी जयंती पर देश भर में याद किया जा रहा है। इस दिन को जगह-जगह पर समारोहपूर्वक मनाते हुए उनके जीवन को आत्मसात करने की प्रेरणा दी जा रही है। वैसे मोहनदास करमचन्द गांधी जिन्हें दुनिया महात्मा गांधी के नाम से जानती है को कौन नहीं जानता। हिंदुस्तान को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्र करनवाने में मुख्य किरदार निभाने वाले महात्मा गांधी के बारे में कई जगह पर पढ़ा या देखा जा सकता है। लेकिन शायद कम ही लोगों को इस बात की जानकारी है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का राजस्थान से भी गहरा नाता रहा है। आखिर क्या है गांधी का राजस्थान कनेक्शन आइये आपको बताते हैं।
दरअसल, महात्मा गांधी के सबसे करीबियों में से एक थे जमनालाल बजाज। 4 नवम्बर 1884 को राजस्थान के सीकर के नज़दीक काशी का बास में एक मारवाड़ी परिवार में जन्में जमनालाल बजाज देश के जाने-माने उद्योगपति के साथ ही मानवशास्त्री एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। वे महात्मा गांधी के प्रखर अनुयायी थे और उनके बेहद करीबी थे। सबसे ख़ास बात तो ये है कि गांधीजी ने उन्हें अपने पुत्र की तरह माना हुआ था।
ऐसे आए गांधीजी के संपर्क में
जमनालाल बजाज महात्मा गांधी के जीवन से बहुत प्रभावित थे। दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी पर, बजाज ने गांधी के जीवन के तरीके, उनके सिद्धांतों जैसे अहिंसा और गरीबों के प्रति समर्पण में रूचि ली। वे गांधीजी के उन विचारों से भी सहमत थे जिसमें स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया गया था। बापू की तरह बजाज भी मानते थे कि कुछ ब्रिटिश कंपनियां भारत से सस्ती कच्ची कपास का आयात कर रही हैं और उनका कपड़ा तैयार कर महंगे दामों पर बेचा जा रहा है। बजाज गांधी जी की सादगी और साबरमती आश्रम में व्यतीत की जा रही जीवन शैली से भी खासा प्रभावित रहे। आश्रम में नियमित होने वाली प्रार्थना और शारीरिक काम ने उनको गांधीजी की तरफ आकृष्ट किया। बजाज इतने प्रभावित हुए कि पत्नी जानकी देवी और बच्चों को आश्रम में ही रहने के लिए ले आये।
बजाज का कहना मानते थे बापू
जमनालाल बजाज जब से महात्मा गांधी के संपर्क में आये तब से बापू ने उन्हें अपने बेटे का दर्ज़ा दिया। बेटा तुल्य बजाज की लगभग हर बात मानो बापू माना करते थे। बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी 1930 में साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा पर निकले हुए थे। यात्रा के दौरान गांधी जी ने संकल्प लिया हुआ था कि वे साबरमती आश्रम तभी वापस लौटेंगे जब ब्रिटिश हुकूमत से देश आजाद करा देंगे। इस बीच वे लगभग तीन साल तक जेल और आन्दोलनों में ही व्यस्त रहे। इतना लंबा वक्त बीतने के बाद भी जब देश आजाद नहीं हुआ तब बापू इस बात पर विचार कर रहे थे कि मध्य भारत में ही कहीं अपना आश्रम बनाकर रहने लग जाएं। इस पर जमनालाल बजाज के बापू से ये विचार छोड़ने का आग्रह किया। आखिर बजाज का आग्रह मानते हुए बापू वर्धा रहने चले आए।
गांधी-बजाज के कई तरह के हैं किस्से
वैसे तो महात्मा गांधी अपने जीवन में कई लोगों के संपर्क में रहे। लेकिन जो नाता जमनालाल बजाज के साथ रहा वो शायद ही किसी के साथ देखने को मिला। महात्मा गांधी और जमनालाल बजाज के बीच गहरे ताल्लुकात को लेकर कई तरह के किस्से-कहानियां भी हैं। एक रोचक किस्सा महात्मा गांधी के देशभर में भ्रमण करने के दौरान का है। बात उस समय की है जब जमनालाल बजाज चरखा संघ कोष के कर्ता-धर्ता थे। बापू उस समय चरखा संघ के लिए धन एकत्र कर रहे थे। एक बार भ्रमण करते हुए बापू उड़ीसा पहुंचे और यहां एक सभा को संबोधित करने का कार्यक्रम था। सभा में जैसे ही उनका उद्बोधन ख़त्म हुआ वैसे ही एक वृद्ध निर्धन महिला भीड़ से निकलते हुए बापू के पास पहुंची। वृद्ध महिला ने बापू के पैर छुए और अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक तांबे का सिक्का निकालकर गांधी जी के चरणों में रख दिया। बापू ने भी उस सिक्के को उठाया और उसे संभालकर अपने पास रख लिया। इसे देखकर जमनालाल बजाज ने बापू से सिक्का मांगा तो बापू ने सिक्का देने से इंकार कर दिया। इस पर जमनालाल बजाज बोले कि मैं चरखा संघ के लिए हजारों रुपए के चेक संभालता हूं फिर भी आप मुझ पर इस सिक्के को देने का यकीन नहीं कर रहे हैं, ऐसा क्यों। इस पर बापू ने कहा कि यह सिक्का उन हजारों रुपयों के चेक से कहीं अधिक कीमती है। ये सिक्का शायद उस वृद्धा की कुल जमा पूंजी थी और उसने अपना सारा धन दान दे दिया, इसीलिए यह सिक्का मेरे लिए अनमोल है।
Updated on:
02 Oct 2017 09:41 am
Published on:
02 Oct 2017 08:42 am

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