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महावीर जयंती 2018: जानें राजस्थान में कहां है जैन आस्था के प्रमुख केंद्र

राजस्थान में यहां महावीर या वर्धमान महावीर जयंती 2018 हर साल दुनिया भर में पूरे हर्षोल्‍लास के साथ मनाई जाती है।

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जयपुर

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Rajesh

Mar 28, 2018

Mahavir Jayanti

जयपुर

अहिंसा, त्‍याग और तपस्‍या का संदेश देने वाले जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर या वर्धमान महावीर जयंती 2018 हर साल दुनिया भर में पूरे हर्षोल्‍लास के साथ मनाई जाती है। हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार भगवान महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की 13 वीं तिथि को हुआ था। इसी वजह से जैन धर्म को मानने वाले इस दिन को महावीर जयंती के रूप में मनाते हैं। इस बार महावीर जयंती का पर्व गुरुवार, 21 मार्च को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। आपको बता दें कि दुनिया भर में जैन धर्म के लोग फैले हुए है, राजस्थान में भी जैन धर्म की लोकप्रियता प्रख्यात है।

गौरतलब है कि इंसान कितना भी बड़ा, अमीर या धनवान क्यों ना हो जाए, मगर मन की शांति के लिए मंदिर से अच्छी जगह नहीं होती है। जैन धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म में से है, जिसका संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है। ऋषभ देव जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। महावीर जयंती आने वाली है, तो आइये आज हम आपको राजस्थान में बने कुछ प्रसिद्घ जैन मंदिरों के बारे में बताते है।


दिगंबर जैन मंदिर चूलगिरी

जयपुर-आगरा रोड पर घाट की गूणी के पास चूलगिरी की पहाड़ी पर स्थित दिगंबर जैन मंदिर जयपुर में धार्मिक पर्यटन के लिए खास केंद्र बनता जा रहा है। बारिश के दौरान यहां धोंक का जंगल हरा-भरा हो जाता है और वातावरण सुरम्य हो जाता है। मंदिर से जंगल का नजारा देखने के लिए भी यहां लोग बड़ी संख्या में आते हैं। यहां घना जंगल होने से वाइल्ड लाइफ भी है। यहां तक पहुंचने के लिए लगभग 1000 सीढियां बनी हुई हैं। महावीर जयंती वर्ष 1953 में देशभूषण जी महाराज की प्रेरणा से इस पर्वत पर मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान में यहां चरण चौबीसी, चौबीसी तथा तीन बड़ी प्रतिमाएं हैं और एक विशालकाय 21 फुट की भगवान महावीर की प्रतिमा भी है। यह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र है। हर साल मई में यहां बड़ा उत्सव मनाया जाता है। घाट की गूणी सुरंग के निर्माण के बाद यहां पहुुंचने की राह आसान हुई है।


नारेली जैन मंदिर

जयपुर के अजमेर में बने नारेली जैन मंदिर के निर्माण की नींव 1994 में रखी गई थी। इस मंदिर के निर्माण में लगभग 100 करोड़ का खर्च आया था। यह मंदिर पूरे जयपुर में प्रसिद्ध है। महावीर जयंती पर इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।


मीरपुर जैन मंदिर

यह मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले के मीरपुर में स्थित है। मीरपुर जैन मंदिर राजस्थान में मार्बल से बना सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। इसका निर्माण ९वी शताब्दी में हुआ था। यह 1100 साल पुराना मंदिर है, जो भगवान पार्श्वनाथ जी को समर्पित है। इस मंदिर की लोकप्रियता इतनी है कि इस मंदिर का जिक्र च् वर्ल्ड एंड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ आर्टज् में भी है।

श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र पदमपुरा, जयपुर

जयपुर-कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग पर ग्राम शिवदासपुरा से ६ किलोमीटर दूरी पर यह मंदिर स्थित है। दिगम्बर जैन धर्मावलम्बियों में श्रद्धा के केन्द्र इस मंदिर की ख्याति देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में है। मन्दिर पर धर्मावलम्बियों के सशुल्क रूकने व भोजनालय की व्यवस्था है। वैशाख शुक्ल पंचमी विक्रम संवत 2001 को श्री मूला जाट नाम के व्यक्ति द्वारा खुदाई करते समय भगवान श्री पदमप्रभु की मूर्ति प्रकट हुई। यह प्रतिमा पदमासन में है। इसके पश्चात् इस क्षेत्र का निर्माण हुआ और वर्तमान में एक भव्य मन्दिर बनाया गया है। मूल मन्दिर में मूल प्रतिमा के अतिरिक्त 10 अन्य प्रतिमा भी विराजमान है। चार कोनों पर चार छोटे मन्दिर भी बने हुये हैं। सम्पूर्ण मंदिर परिसर सफेद संगमरमर से बना हुआ है। मूल मन्दिर के पीछे खुले में २७ फीट विशालकाय भगवान बाहुबलि की प्रतिमा भी है। यह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र है।


रणकपुर जैन मंदिर

राजस्थान में बना भव्य रणकपुर जैन मंदिर, जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण १५ वीं शताब्दी में राणा कुंभा के शासनकाल में प्रारम्भ हुआ था। यह मंदिर जैन पंथ के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण मंदिर होने के लिए जाना जाता है, जोकि भगवान आदित्यनाथ को समर्पित है। इस मंदिर के परिसर में एक छोटा सा सूर्य मंदिर भी है, जिसकी देख-रेख उदयपुर के रॉयल परिवार ट्रस्ट द्वारा की जाती है।


दिलवाड़ा मंदिर

दिलवाड़ा मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू नगर में स्थित है। इसका निर्माण ११ वीं और १३वीं सदी के बीच वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाईयों ने कराया था। माउंट आबू पर स्थित इस मंदिर को राजस्थान का ताजमहल भी कहा जाता है। इस मंदिर के निर्माण में कुल 1500 कारीगर लगे थे, तब जाकर इस भव्य मंदिर का निर्माण १४ साल में हो पाया था। तत्कालीन समय के अनुसार इस मंदिर की लागत लगभग १२ करोड़ ५३ लाख रुपय थी।