
राजस्थान पंचायत-निकाय चुनाव। पत्रिका फाइल फोटो
जयपुर। राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर अनिश्चितता गहराती जा रही है। लाखों लोग चुनाव तारीखों के ऐलान का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार, राज्य निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग के बीच तालमेल के अभाव में प्रक्रिया अटकी हुई है।
इस बीच, निकायों और पंचायतों में नियुक्त प्रशासक मनमाने ढंग से हजारों करोड़ रुपए का बजट खर्च कर रहे है। अदालतों द्वारा निर्धारित 15 अप्रैल की समय-सीमा नजदीक है, लेकिन निकायों की मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन तय समय के बाद होना प्रस्तावित है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।
फरवरी में आयोग ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर 400 ग्राम पंचायतों के अधूरे आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा था, लेकिन अब तक डेटा नहीं मिला। आयोग का कार्यकाल 31 मार्च को समाप्त हो रहा है और अभी तक नहीं बढ़ाया गया। मई 2025 में गठित आयोग का कार्यकाल पहले दो बार बढ़ चुका है।
हाल ही में राज्य विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष ने चुनाव का मुद्दा उठाया, जिस पर पक्ष-विपक्ष में तकरार भी हुई। नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा और पंचायत राज मंत्री मदन दिलावर पहले तो समय पर चुनाव कराने के दावे करते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से दोनों मंत्रियों ने चुनाव पर बयान देना बंद कर दिया है।
18 अगस्त 2025: हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पंचायत चुनाव में देरी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग मौन नहीं रह सकता और समय पर चुनाव कराना उसकी जिम्मेदारी है।
20 सितंबर 2025: शहरी निकाय चुनाव को लेकर भी आयोग को तय समय में चुनाव कराने के निर्देश दिए गए।
14 नवंबर 2025: खंडपीठ ने 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन और 15 अप्रेल 2026 तक चुनाव कराने के आदेश दिए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
24 मार्च 2026: पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की अवमानना याचिका पर सुनवाई के लिए 2 अप्रेल की तारीख तय की गई।
राज्य के नगरीय निकायों और पंचायतों का कुल बजट करीब 16 हजार करोड़ रुपए है। निकायों में सालाना 5000-6000 करोड़ खर्च होते हैं, जिनमें 30-50% राशि विकास कार्यों पर और शेष वेतन, मेंटेनेंस व प्रशासन पर जाती है। विकास कार्यों पर लगभग 2000-2500 करोड़ खर्च होते हैं। बीते डेढ़ साल से निकायों में अधिकारियों के हाथों कमान है। पंचायतों में भी 10 हजार करोड़ से अधिक बजट खर्च हो रहा है, जहां नौकरशाही पर मनमानी के आरोप लग रहे हैं।
प्रदेश में अभी सरकार की स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए चुनाव में हार का डर सता रहा है। निकाय-पंचायतों को अफसरों को सौंप दिया गया है। जनप्रतिनिधियों की भूमिका खत्म कर दी गई है। संविधान में स्पष्ट है कि 5 साल बाद चुनाव होने चाहिए।
-टीकाराम जूली, नेता प्रतिपक्ष विधानसभा
मैं फिर दोहरा रहा हूं कि नगरीय निकाय चुनाव समय पर नहीं होने में सरकार की कोई बाधा नहीं है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट मिलने का इंतजार है। जिस दिन निर्वाचन विभाग चुनाव तारीख तय कर देगा, उस दिन हम करा देंगे।
-झाबर सिंह खर्रा, स्वायत्त शासन मंत्री
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय स्पष्ट हैं कि चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का दायित्व है। पांच साल में चुनाव कराना बाध्यकारी है। मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार चुनाव कराए जाने चाहिए, बदलाव आगे के चुनाव में किए जा सकते हैं।
-मधुकर गुप्ता, पूर्व निर्वाचन आयुक्त
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Updated on:
30 Mar 2026 08:24 am
Published on:
30 Mar 2026 08:22 am
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