hindola festival : जयपुर / करोली। श्रावण की तीज ( sawan ki teej ) पर आज ठाकुर श्री मदनमोहनजी ने मखमल के हिंडोले में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन दिए। दर्शनों के लिए सुबह से ही भक्त उमड़ पड़े। इस दौरान मंदिर परिसर मदन मोहन सरकार के जयकारों से गुंजायमान होता रहा। इस दौरान महिलाओं ने हिंडोला कुंज बन डारो री, झूलन आईं राधिका प्यारी… जैसे हिंडोले के भजनों से अराध्य मदनमोहन जी को खूब रिझाया। श्रावण मास में तीज के त्योहार पर ठाकुरजी को गर्भ के बहार जगमोहन में हिंडोला ( hindola ) में बिराजमान कर झूला ( jhoola ) झूलाया जाता है। अपने अराध्य को झुलाने व झांकी के दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में भक्त मदनमोहन के दरबार में पहुंचे। हिंडोला महोत्सव ( hindola mahotsav ) में सजी झांकी व भजनों से ब्रज संस्कृति साकार हो उठी। करोली के अन्य मंदिरों में भी हिंडाला महोत्सव मनाए जा रहे हैं।
सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद
हिंडोल महोत्सव में आने वाले श्रद्धालुओ की संख्या को देखते हुए भारी पुलिस का जाब्ता तैनात किया गया। मंदिर परिसर में सादा वर्दी में भी पुलिसकर्मी तैनात किए गए। वहीं सीसी टीवी कैमरों से भी असामाजिक तत्वों पर नजर रखी जा रही है। मंदिर जाने वाले मार्ग में वाहनों के प्रवेश को निषेध किया गया है।
यह है मंदिर का इतिहास
मदन मोहन जी की प्रतिमा मूल रूप से वृंदावन ( vrindavan ) में कालीदह के पास द्वादशादित्य टीले से प्राप्त हुई थी। वृंदावन पर औरंगजेब के हमले के दौरान मूल मंदिर का शिखर () ध्वस्त कर दिया था। मुगलों के आक्रमण के समय सुरक्षा की दृष्टि से मूर्ति को जयपुर ले जाया गया था। करोली के मंदिर का निर्माण यहां के राजा गोपाल सिंह ने 1725 ई. में करवाया था। बताया जाता है कि दौलताबाद पर विजय के बाद महाराजा गोपाल सिंह को सपना आया जिसमें उन्हें मदन मोहन जी ने कहा कि मुझे करोली ले चलो तब मदन मोहन की प्रतिमा को जयपुर के आमेर से लाकर यहां करोली में हवेली में स्थापित किया गया। महाराजा गोपाल सिंह ने मुर्शिदाबाद के रामकिशोर को मंदिर सेवा का प्रथम प्रभार सौंपा था। इसके बाद मदन किशोर यहां के गुंसाई रहे। उस समय करोली के मंदिर को राजघराने की ओर से अचल संपत्ति प्रदान की गई जिससे 18वीं सदी में 27 हजार रूपया सालना आय होती थी।