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समाज में हाशिये पर खड़े बच्चों को भी डिजिटल शिक्षा का मिलेगा लाभ!

ऑनलाइन माध्यम से क्लासरुम में होने वाला इंटरैक्शन, प्रायोगिक कक्षाएं और लैब वर्क उतने सुचारू रुप से नहीं हो पाएंगे। वहीं बढ़ता हुआ ऑनलाइन माध्यम मानव जीवन की बेसिक बुनियादी सामाजिक आवश्यकता यानी समूह रहने की प्रवृति को खत्म करने का काम करेगा, जिससे अकेला पन जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं.

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समाज में हाशिये पर खड़े बच्चों को भी डिजिटल शिक्षा का मिलेगा लाभ!

समाज में हाशिये पर खड़े बच्चों को भी डिजिटल शिक्षा का मिलेगा लाभ!

जयपुर। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी में भारतीय संसद में बजट भाषण पेश करते हुए देश में डिजिटल यूनिवर्सिटी को आगे बढ़ाने के लिए भारी भरकम बजट की घोषणा की। बजट भाषण देते हुए वित्त मंत्री ने भी इस बात पर जोर दिया कि उनके अनुसार सरकार आने वाले दिनों में डिजिटल यूनिवर्सिटी की स्थापना करेगी और देश के छात्रों को विश्व स्तरीय शैक्षिक सुविधाएं उपलब्ध कराएगी। उन्होंने देश के ग्रामीण अंचलों और विभिन्न भाषाई विविधताओं से आने वाले छात्रों को भी उनकी मूल भाषा में शैक्षिक सामाग्री उपलब्ध कराने पर बल दिया।

IC3 Institute Academic Head अमृता गुलाटी (Amrita Ghulati) ने कहा कि शिक्षा के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने वाले इस प्रगतिशील बजट की शिक्षाविदों द्वारा काफी सराहना भी की जा रही है, क्योंकि यह बजट राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और डिजिटल इंडिया मिशन के दृष्टीकोण को आत्मसात करता हुए ऑनलाइन शिक्षा पद्धति को समृद्ध करने और कौशलयुक्त युवाओं के सृजन में कृत संकल्पित दिखता है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुये कई शिक्षा विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम की यह कहते हुए सराहना की, इससे सरकार देश के विभिन्न स्थानों पर और विभिन्न सामाजिक स्तर के छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध करा पाएगी। देश के सभी छात्रों को समान रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी, जिससे देश के अति पिछड़े/पिछड़े, गरीब, वंचित वर्ग के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकेगी।

अमृता गुलाटी (Amrita Ghulati) ने कहा कि हालांकि देश में डिजिटल अध्ययन को लेकर कई तरह की चुनौतियां भी हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार तीन या उससे अधिक सदस्यों वाले 71 प्रतिशत घरों में दो कमरे या उससे भी कम आवासीय स्थान हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों को पढ़ने के लिये अलग से स्थान उपलब्ध कराना एक दुष्कर कार्य साबित होगा। इसके अलावा ऑनलाइन माध्यम से क्लासरुम में होने वाला इंटरैक्शन, प्रायोगिक कक्षाएं और लैब वर्क उतने सुचारू रुप से नहीं हो पाएंगे। वहीं बढ़ता हुआ ऑनलाइन माध्यम मानव जीवन की बेसिक बुनियादी सामाजिक आवश्यकता यानी समूह रहने की प्रवृति को खत्म करने का काम करेगा, जिससे अकेला पन जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं.

Ghulati ने कहा कि वहीं वर्ष 2017-18 के नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट को देखें तो कोवल 42 प्रतिशत शहरी और 15 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट की सुविधा मौजूद थी और केवल 34 प्रतिशत शहरी एंव 11 प्रतिशत ग्रामीण व्यक्तियों ने पिछले 30 दिनों में इंटरनेट का उपयोग किया था। ये आंकड़े स्पष्ट रुप से इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ऑफलाइन शिक्षा प्रणाली के संचालन में स्वाभाविक रूप से कम से कम दो तिहाई बच्चे ऑनलाइन शिक्षा प्रक्रिया से बाहर हो जायेंगे और हमेशा की तरह इस प्रक्रिया में भी सबसे अधिक प्रभावित आबादी हाशिये पर मौजूद ग्रामीण और गरीब आबादी ही होगी. सरकार को चाहिये कि आने वाले सदी के विकास के लिये हाशिए पर खड़े इन बच्चों पर ध्यान देते हुए वह पूर्ण सामंजस्यता के साथ काम करे और वर्तमान 21 वीं सदी को भारत की सदी बनाने के सपने को और मजबूत करे।