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विकास जैन
जयपुर। कम अंक के बावजूद मोटी फीस के जुगाड़ से निजी मेडिकल कॉलेजों के एमबीबीएस पाठयक्रम में प्रवेश पाने वालों को अगले सत्र से एक्जिट परीक्षा की बड़ी चुनौती का सामना करना होगा। इस परीक्षा में सभी विद्यार्थियों को न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक लाने ही होंगे। उसके बाद ही वे डॉक्टर के रूप में प्रेक्टिस कर पाएंगे।
यह फिल्टर नेशनल मेडिकल कमीशीन (एनएमसी) की ओर से पूर्व में ही घोषित किया जा चुका है, जो वर्ष 2024 से लागू करने की तैयारी है। अभी प्रवेश पाने वाले उम्मीदवारों का चार वर्ष बाद पाठयक्रम पूरा होगा। ऐसे में इन्हें इस परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। एनएमसी का यह फिल्टर सरकारी नौकरी के लिए आयोजित होने वाली मेडिकल ऑफिसर (एमओ) प्रतियोगी परीक्षा सहित विदेश से एमबीबीएस करने पर भी लागू होगा। राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में तो मेडिकल टीचर्स की भारी कमी है। इसके कारण राज्य सरकार खुद एनएमसी निरीक्षण के समय जुगाड़ की फेकल्टा का इंतजाम डॉक्टरों के तबादले कर करती है। ऐसे कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई नहीं होने पर इनके विद्यार्थियों के लिए भी यह परीक्षा संकट खड़ा कर सकती है।
संकट के बड़े कारण
- राज्य के कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस के संपूर्ण पाठय्रक्रम की फीस करीब एक करोड़ रुपए तक है। इनमें हायर रैंकर विद्यार्थियों को वरीयता के आधार सीटें तो मिली, लेकिन अधिक फीस के कारण इन्होंने सीट छोड़ दी
- अब खाली रही सीटें कम अंक वालों से भरी जा चुकी है। नीट परीक्षा में मुताबिक न्यूनतम उत्तीण प्रतिशत 17 है। ऐसे में यदि 20 प्रतिशत अंक वाले का भी एमबीबीएस में प्रवेश मिलता है तो उसके लिए एक्जिट परीक्षा पास करना चुनौती के रूप में होगा।
राजस्थान के लिए भी चुनौती
- मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने के बाद एमबीबीएस में कम अंक वालों का भी प्रवेश आसान हो गया है
- कम संसाधनों और जुगाड़ की फेकल्टी से एमबीबीएस कराई जा रही है, सरकार खुद इसमें शामिल है और एनएमसी निरीक्षण के समय चिकित्सक शिक्षकों के तबादले अस्थायी तौर पर करती है
- अब प्रवेश पाने के बाद ढंग से पढ़ाई नहीं हुई तो विद्यार्थियों को एक्जिट परीक्षा में इसकी कीमत चुकानी होगी
(चिकित्सा शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार)
Published on:
04 Jan 2023 02:11 pm
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