
एवरेस्ट की दुर्गम चोटी कैसे बन गई टूरिस्ट स्पॉट
जयपुर.
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर पर्वतारोहण हमेशा ही जितना रोमांचक रहा है उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। इसे फतह करने का सिलसिला न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के शेरपा तेनसिंह से शुरू होता है। लेकिन रहस्य और रोमांच की कहानियों से आबाद इस चोटी पर शोर्यगाथाओं की जगह अब पर्यटन ने ले ली है। अब पर्वतारोही समूहों में जाने लगे हैं और शेरपाओं की मदद से चोटी पर पहुंचकर फोटो खिंचवाते हैं। ऐसा नहीं कि सभी पर्वतारोही ऐसा करते हैं, लेकिन ज्यादातर। इस साल दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट तक पहुंचने के प्रयास में ११ लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसकी वजह यहां चार वर्ष में सबसे खराब मौसम का होना और पर्वतारोहियों की भीड़। उधर नेपाल का पर्वतारोहियों की संख्या कम करने का इच्छुक नहीं है, क्योंकि ये उनके राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। नेपाली सरकार ने इस वर्ष माउंट पर चढऩे के लिए 381 परमिट जारी किए हैं, जो एक रेकॉर्ड है। एवरेस्ट पर बढ़ती भीड़ यह भी दर्शाती है कि एवरेस्ट पर चढऩा अब कैसे एक व्यापार बन गया है, जो न केवल रोमांच के इच्छुक अनुभवहीन पर्वतारोहियों को खींच रहा है, बल्कि इससे पहाड़ों पर कचरे से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ पर चढऩा अब एक रोमांच से अलग ट्रॉफी की चाह बन रही है। लोगों की भीड़ और जलवायु परिवर्तन के चलते माउंट एवरेस्ट के कई रास्तों में बर्फ पिघलने लगी है। पुराने पर्वतारोही अब नेपाल की तरफ से माउंट पर चढ़ाई से बच रहे हैं, इसकी वजह माउंट एवरेस्ट के कुछ रास्तों में बर्फ का पिघलना है।
खतरनाक होता जा रहा है पर्वतारोहण
क्लाइंबिंग कंपनी के फिल क्रॉप्टन कहते हैं कि तापमान बढऩे से हिमपात के कारण हिमालय खतरनाक जगह बन रहा है। पश्चिमी देशों की तुलना में सस्ता होने के कारण एवरेस्ट पर पर्वतारोहियों की संख्या बढ़ी है और उनके खानपान व अन्य सुविधाएं देने वाली स्थानीय कंपनियों के कारण भी भीढ़ बढ़ी है। बिना ऑक्सीजन माउंट पर चढऩे वाले पर्वतारोही इटली के रेनहोल्ड मेसनर का कहना है कि ये चिंता की बात है कि 99 फीसदी पर्वतारोही पर्यटन के लिहाज से माउंट पर चढ़ रहे हैं। एवरेस्ट चढ़ाई की बजाय टै्रकिंग रूट बन गया है।
हर वर्ष खिसक रहा है खुंब ग्लेशियर
बढ़ते खतरों को देखते हुए कई दिग्गज पर्वतारोही अब नेपाल की बजाय तिब्बत के रास्ते से माउंट की चढ़ाई कर रहे हैं। इनका कहना है कि बढ़ते तापमान और अनुभवहीन पर्वतारोहियों की बढ़ती भीड़ के कारण नेपाल की तरफ रास्तों में बर्फ पिघलने लगी है। बढ़ती भीड़ ने प्रसिद्ध खुंबू आइसफाल को भी खतरनाक बना दिया है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डवलपमेंट के शोध से पता चलता है कि खुंब ग्लेशियर प्रतिवर्ष औसतन 65 फीट पीछे हट रहा है, जिससे हिमस्खलन का खतरा बढ़ गया है। नेपाली पर्वत गाइड को शेरपा कहा जाता है। ये हर वर्ष टै्रक तैयार करते हैं और रस्सी और सीढिय़ों के माध्यम से अप्रेल और मई में पर्वतारोहियों को चढ़ाते हैं। पहले ये दो से तीन लोगों को चढ़ा लेते थे, लेकिन इन्होंने इसमें कटौती की है।
भीड़ के कारण रास्ता बनाना मुश्किल
इस साल मरने वालों में भारतीय निहाल भगवान थे, जिनकी थकान और निर्जलीकरण के कारण मौत हो गई थी। भगवान की यात्रा को प्रमोट करने वाली कंपनी के केशव पौडेल ने बताया कि उसने चढ़ाई के बीच दो ठहराव केंद्रों पर एक की बजाय दो-दो दिन बिताए। भीड़ के कारण कुछ पर्वतारोहियों को रास्ता बनाने में अधिक समय लगा।
पिछले वर्ष 14 टन कचरा साफ किया
प्रत्येक पर्वतारोही औसतन 18 किलो अपशिष्ट चढ़ाई के दौरान छोड़ता है। 2018 में 14 टन कचरा और अपशिष्ट बेस कैंप व अन्य स्थानों से साफ किया गया। इस वर्ष मई में 3 टन कचरा साफ किया। एक तिहाई कचरे को हेलीकॉप्टर से रिसाइकल के लिए काठमांडू लाया गया, जबकि शेष को लैंडफिल के लिए ओखलढुंगा भेजा गया।
ऊंचाई में क्या परेशानी
ऊंचाई बढऩे के साथ-साथ शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती जाती है, जिससे शरीर की सामान्य गतिविधियां मुश्किल होने लगती हैं। साथ ही भ्रम, असमंजस, गलत निर्णय, सिरदर्द मतली और संतुलन खराब होने जैसी ऊंचाई से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं।
नेपाल को 31 करोड़ आय
कॉलारेडो के पर्वतारोही और एवरेस्ट ब्लॉगर एलन एर्नेट के मुताबिक अकेले एवरेस्ट परमिट देने से ही नेपाल सरकार को हर वर्ष करीब 31 करोड़ रुपए की आय होती है। जबकि गाइड, होटल, पोर्टर और ट्रंासपोर्टेशन अलग है।
छोटा रास्ता भी बनाया
2015 में सरकार ने पर्वतारोहण के इच्छुक लोगों के लिए 21 हजार फुट का एक छोटा मार्ग तैयार किया था। इसमें 18 वर्ष से कम और 75 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए प्रतिबंध था।
कैसा कचरा
पर्वतारोहियों के छोड़े टैंट, बोतेलें, डिब्बे, ऑक्सीजन के खाली सिलेंडर और मानव अपशिष्ट एवरेस्ट के पर्यावरण को लील रहा है। इस साल तीन टन कचरा साफ किया गया।
वो सब जो आप जानना चाहते हैं
- 8848 मीटर है माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई। जबकि चीन 8844 मीटर ऊंचाई मानता है।
- 2 माह का औसतन समय लगता है माउंट एवरेस्ट पर चढऩे में, इस पर चढऩे के दो रास्ते हैं-एक दक्षिण-पूर्व की ओर से, जो नेपाल से जाता है। दूसरा उत्तरी मार्ग, जो तिब्बत की ओर से है।
- 17 लाख से 28 लाख तक लेती हैं नेपाली एजेंसियां पर्वतारोहण के लिए प्रति व्यक्ति जबकि पश्चिमी कंपनियां 45 हजार डॉलर यानी करीब साढ़े 31 लाख रुपए लेती हैं।
- 266 लोग जान दे चुके हैं अब तक चोटी पर चढऩे के प्रयास में 1977 ही ऐसा वर्ष था, जब किसी की मौत नहीं हुई। इस वर्ष दो लोगों ने पर्वतारोहण किया।
10 टन कचरा साफ करने का लक्ष्य
पहाड़ों को साफ रखना हमारी जिम्मेदारी। 75 दिन में अभियान चलाकर 10 टन कचरा साफ करने का लक्ष्य है, जिसे 14 सदस्यी दल पूरा करेगा।
-डंडूराज घिमिरे, नेपाल में पर्यटन मंत्रालय के अधिकारी
Published on:
02 Jun 2019 01:56 pm
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