
इम्पॉर्टेंट मैसेज के साथ कॉलेज लाइफ की नॉस्टैल्जिया ट्रिप है 'छिछोरे'
आर्यन शर्मा/जयपुर. मौजूदा दौर में कॉम्पीटिशन काफी बढ़ गया है, इसलिए स्टूडेंट्स पर खुद को साबित करने का बहुत प्रेशर है। भले ही यह प्रेशर पैरेंट्स की एक्सपेक्टेशंस का हो या फिर अपने क्लासमेट्स से तुलना का। इसी कारण ज्यादातर टीनेज और यंग स्टूडेंट्स स्ट्रेस में रहते हैं। सक्सेस के बाद की प्लानिंग तो सब करते हैं, लेकिन अगर विफल हो गए तो उसे कैसे फेस करना है, यह कोई नहीं बताता। यही वजह है कि जब कोई स्टूडेंट किसी कॉम्पीटेटिव एग्जाम में फेल हो जाता है तो वह खुद को लूजर समझने लगता है। बहुत से स्टूडेंट्स तो ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए फेल होने पर जीवन के मायने ही खत्म हो जाते हैं और वे सुसाइड जैसा कदम उठा लेते हैं। 'दंगल' फेम निर्देशक नितेश तिवारी की फिल्म 'छिछोरे' (Chhichhore) यूं तो कॉलेज लाइफ और दोस्ती के इर्द-गिर्द घूमती है, पर साथ ही यह मैसेज भी देती है कि बच्चों को फेलियर से डील करना भी सिखाना जरूरी है। कहानी में डिवोर्सी कपल अनिरुद्ध पाठक (सुशांत सिंह राजपूत) व माया (श्रद्धा कपूर) का टीनेज बेटा राघव इंजीनियरिंग का एंट्रेंस एग्जाम क्लीयर नहीं कर पाता। जबकि उसके माता-पिता अपने दौर में रैंक होल्डर रहे थे। पीयर प्रेशर में आकर वह खुद को लूजर मान लेता है और बिल्डिंग से छलांग लगा देता है। उसे गंभीर हालत में हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता है। डॉक्टर उसके माता-पिता को बताता है कि राघव की कंडीशन क्रिटिकल है। यहां तक कि उसमें जीने की इच्छाशक्ति ही नहीं बची है। ऐसे में अनिरुद्ध को लगता है कि राघव को लूजर की सोच के अंधियारे से बाहर निकालने के लिए एक ही रास्ता है और वह है अनिरुद्ध की अपनी कॉलेज लाइफ। वह हॉस्पिटल में ही राघव को ट्रीटमेंट के दौरान अपनी कॉलेज लाइफ बताना शुरू करता है। कहानी फ्लैशबैक में जाती है, जहां इंजीनियरिंग कॉलेज में अनिरुद्ध व उसके हॉस्टल के दोस्तों सेक्सा (वरुण शर्मा), एसिड (नवीन पोलीशेट्टी), मम्मी (तुषार पांडे), डेरेक (ताहिर राज भसीन) और बेवड़ा (सहर्ष शुक्ला) पर लूजर का टैग है। आगे कहानी इस बात का खुलासा करती है कि उन्हें लूजर क्यों बुलाया जाता है और इन दोस्तों की लाइफ में क्या उतार-चढ़ाव आते हैं।
नितेश तिवारी से उम्मीद ज्यादा थी
स्क्रिप्ट साधारण है। फिल्म '3 इडियट्स' की याद दिलाती है, पर उसके इमोशंस को सतही तौर पर ही छूकर निकल जाती है। स्क्रीनप्ले क्रिस्प नहीं है। पहला हाफ स्लो है। इंटरवल के बाद फिल्म गति पकड़ती है। कॉलेज लाइफ की मस्ती, हॉस्टल के गलियारे, सीनियर्स द्वारा जूनियर्स की रैगिंग, छिछोरी हरकतें, दो हॉस्टल्स के छात्रों के बीच टशन व ईगो का माहौल, लूजर के टैग की चुभन, स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप और जीत के लिए तिकड़म लगाने वाले दृश्य मजेदार हैं। डायलॉग्स कॉलेज यूथ की आपसी बोलचाल जैसे हैं, जो दर्शकों को उनकी कॉलेज लाइफ से कनेक्ट करते हैं। नितेश का निर्देशन उतना सधा हुआ नहीं है, जितना 'दंगल' का था। उनसे उम्मीद ज्यादा थी, पर वह उस स्तर को मैच नहीं कर सके। म्यूजिक एवरेज है। सुशांत सिंह राजपूत की परफॉर्मेंस ठीक है। हालांकि ओल्डर लुक में वह ज्यादा कॉन्फिडेंट नहीं लगे। श्रद्धा कपूर सिर्फ फिल्म में हीरोइन की जगह भरती हैं, क्योंकि उनके लिए मूवी में ज्यादा स्कोप नहीं है। वरुण शर्मा 'फुकरे' फिल्म सीरीज के 'चूचा' के बाद फिर से फुल फॉर्म में हैं। उनकी स्क्रीन अपीयरेंस ठहाके लगवाने में कामयाब रही है। फिल्म के टाइटल 'छिछोरे' को सही रूप से वही सार्थक करते हैं। ताहिर राज भसीन का अभिनय असरदार है। नवीन पोलीशेट्टी, तुषार पांडे, प्रतीक और सहर्ष शुक्ला ने अपने किरदार अच्छे से निभाए हैं। सिनेमैटोग्राफी ठीक-ठाक है। टाइट एडिटिंग की कमी खलती है।
क्यों देखें: 'छिछोरे' कॉलेज की यादों का एलबम है, जिसमें वो दिन छुपे हुए हैं, जब यार ही जान हुआ करते थे। कहानी में उन दिनों के अद्भुत अहसास को पिरोने की कोशिश की है। साथ ही एक अहम संदेश भी है। हालांकि फिल्म में कई कमियां हैं, मगर उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाए तो इम्पॉर्टेंट मैसेज के साथ कॉलेज लाइफ की नॉस्टैल्जिया ट्रिप के लिहाज से एक बार देख सकते हैं 'छिछोरे'।
Published on:
04 Sept 2019 08:00 pm
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