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Jhunjhunu : बदलाव की बयार, बेटी के जन्म पर कुआं पूजन

-खेतड़ी में एक परिवार ने पेश की मिसाल, नई परंपरा की शुरुआत से दिया समाज को संदेश, कहा-बेटे-बेटी में कोई अंतर नहीं

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जयपुर

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Amit Pareek

Jul 19, 2019

झुंझुनूं ( Jhunjhunu ) . खेतड़ी ( khetri ) कस्बे में एक परिवार ने अनूठी परंपरा की शुरुआत की है जिसने सभी का ध्यान खींचा है। अमूमन बेटे के जन्म की खुशी में निभाई जाने वाली कुआं पूजन ( kuaa pujan ) की परंपरा को बेटी के जन्म पर निभाई। हर्षोल्लास से कुआं पूजन किया गया। महिलाओं ने मंगल गीत गाए। बैंड बाजे की धुनों पर परिवार की महिलाओं ने ताल से ताल मिलाई। बात हो रही है प्रदीप सुरोलिया ( suroliya ) और सुधा की जिन्होंने पौती रिया के जन्मोत्सव पर बहू निर्मला को गाजे-बाजे के साथ कुआं पूजन करवाया। इस अवसर पर महिलाओं ने मंगल ( mangal ) गीत गाए। आयोजन के बारे में परिवार का कहना था कि आज के दौर में पुत्र-पुत्री में कोई अंतर नहीं है। इस तरह के आयोजन से समाज में अच्छा संदेश जाएगा। लोग इसे अपनाएंगे और बेटे-बेटी के बीच फर्क करने वालों की भी सोच बदलेगी।

सदियों से चली आ रही परंपरा
कुआं पूजन हमारी ढेरों रीति-रिवाजों या रस्मों में से सबसे अहम कही जा सकती है। विवाह या बेटे के जन्म पर यह रस्म अदा की जाती है। सदियों से चली आ रही यह रस्म शुभ कार्य की शुरुआत का संकेत माना जाता है। मान्यता तो यह भी है कि हर शुभ कार्य में कुआं पूजन परंपरा का निर्वहन होता है। बेटे के जन्म के 12वें दिन कुआं पूजन किया जाता है। इस रस्म के बाद जच्चा को पवित्र माना जाता है। जच्चा हल्दी, चावल तथा रोली से कुआं पर पूजन करती है। इस दौरान नाते-रिश्तेदार कुआं पूजन से जुड़े मंगल गीत गाती हैं।
बारात जाने से पहले भी दूल्हा और उसके परिजन कुआं पूजन करते हैं।

कृष्ण-यशोदा से भी जुड़ी मान्यता
भगवान कृष्ण ( Lord Krishna ) जन्म के 11वें दिन माता यशोदा ( Yashoda ) ने उनका जलवा पूजन किया था। यह दिन डोल ग्यारस के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जलवा पूजन के बाद ही संस्कारों की शुरुआत होती है। जलवा ( Jalwa ) पूजन को कुआं पूजन भी कहा जाता है।