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ऑनलाइन फैंटेसी गेम्स अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में

रोक के लिए कानून बनाने का आदेश देने से हाईकोर्ट का इनकार, याचिका खारिज

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने ऑनलाइन फैंटेसी गेम्स को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में माना है। कोर्ट ने इस मामले में याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इन गेम्स पर रोक के लिए कानून बनाने का आदेश देना संविधान के तहत दी गई अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ होगा।
जिस पर मुख्य न्यायाधीश इंद्रजीत माहान्ति और न्यायाधीश सतीश कुमार शर्मा ने साहिल नलवाया की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में कहा था कि पैसा लगाकर जीतने की संभावना या दावा करना पूरी तरह गलत है। याचिका में ऐसे गेम्स को स्किल के बजाय सट्टेबाजी से जुड़ा बताया। साथ ही आॅनलाइन गेम्स को लेकर कानून की आवश्यकता बताते हुए कोर्ट से इस मामले में कानूनी प्रावधान करने का निर्देश देने की गुहार की गई थी। इसके जवाब में फेडरेशन ऑफ इंडियन फैंटेसी स्पोर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऑनलाइन फैंटेसी गेम्स विशिष्ट स्किल के खेल हैं। ये जुआ एवं सट्टे से अलग हैं। ये खेल संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(जी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में हैं। स्किल के आधार पर जीतने वाले विजेता को केवल इनाम दिया जाता है यह संभावनाओं का खेल नहीं है। फेडरेशन ने नीति आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के साथ आईआईएम बैंगलोर किए गए शोध की कोर्ट को जानकारी दी। साथ ही कोर्ट से कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले इस संबंध में पहले ही आ चुके हैं। कोर्ट ने सभी पक्ष सुनने के बाद रोक लगाने के लिए राज्य सरकार को कानूनी प्रावधान करने के निर्देश देने से इनकार कर दिया।


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