5 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

icon

प्रोफाइल

अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं- डॉ.महेश चंद्र

भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। हमारा समाज जातियों में अवश्य रहा लेकिन अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के रूप में परिभाषित नहीं हुआ। यह एक साम्राज्यवादी अवधारणा है।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Rakhi Hajela

Jun 26, 2022

अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं- डॉ.महेश चंद्र

अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं- डॉ.महेश चंद्र

अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं- डॉ.महेश चंद्र
'संविधान सभा, संविधान और अल्पसंख्यक एक विमर्श 'विषय पर संगोष्ठी
जयपुर। भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। हमारा समाज जातियों में अवश्य रहा लेकिन अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के रूप में परिभाषित नहीं हुआ। यह एक साम्राज्यवादी अवधारणा है। यह बात पूर्व राज्यसभा सांसद औरं अध्यक्ष डॉ.महेश चंद्र शर्मा ने जवाहर लाल नेहरु मार्ग स्थित डॉ. राधाकृष्णन लाइब्रेरी में 'संविधान सभा, संविधान और अल्पसंख्यक एक विमर्श 'विषय को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि 1909 के सुधारों से यह बात सामने आई और 1935 के एक्ट में शामिल हुई, उसके बाद से ही यह संविधान में शामिल हुई। उसमें भी केवल भाषाई और रिलीजन अल्पसंख्यक की बात है। इस संबंध में भारतीय संविधान सभा की बहस आंख खोलने वाली ह, लेकिन बाद में राज्य और राजनीति ने अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का भेद बढ़ा दिया। वोट बैंक की राजनीति के कारण हम भारत के लोग जो कि संविधान की मूल भावना है उसको भूला कर अल्पसंख्यक वाद बहुसंख्यक वाद का माहौल बना दिया गया है। हमारे संविधान पर सहजता से चर्चा किए जाने की आवश्यकता है ताकि समाज में एकता और समरसता की भावना बढ़े। महेश शर्मा ने बताया कि देश हित के लिए संविधान सभा की भावना हर नागरिक को जानना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता रमन नंदा ने कहा कि, 1919 में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के समय शैक्षिक संस्थाओं मैं अपने धर्म के हिसाब से शिक्षा देने की मांग की गई थी। उस समय ईसाई समाज की ओर से यह सभी के लिए मांग की गई थी। भारतीय संविधान बनने के बाद अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकार का यह मतलब निकाला गया कि केवल अल्पसंख्यक ही अपने शैक्षिक संस्थान संचालित कर सकते हैं और बहुसंख्यक नहीं। हमारे संविधान और सविधान पर परिष्कृत बहस की आवश्यकता है। इस संगोष्ठी को प्रोफेसर प्रह्लाद राय ने भी संबोधित किया।