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जयपुर की सुरक्षा पर बड़ा सवाल…न रिकार्ड, न आधार…फिर कैसे हो पहचान

राजस्थान पत्रिका रिपोर्टर ने शहर के कई इलाकों और बाजारों में जाकर थड़ी-ठेला, ई-रिक्शा चालकों और मजदूरों से बातचीत की। ज्यादातर के पास आधार कार्ड नहीं थे। कुछ ने होने की बात स्वीकारी, लेकिन दिखा नहीं पाए।

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जयपुर. जयपुर की पहचान ऐतिहासिक धरोहर, पर्यटन और आधुनिक शहरी विस्तार से है। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक ऐसी दुनिया भी बसती है, जो न नक्शों में दर्ज है और न ही सरकारी रिकॉर्ड में पूरी तरह मौजूद है। झोपड़-पट्टियों से लेकर सड़कों, रेलवे स्टेशन और बाजारों तक फैली यह आबादी वर्षों से बिना आधार और कई मामलों में बिना किसी वैध पहचान के रह रही है। अब यह मुद्दा केवल सामाजिक या मानवीय सरोकार का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।सिस्टम से बाहर लोग

राजस्थान पत्रिका रिपोर्टर ने शहर के कई इलाकों और बाजारों में जाकर थड़ी-ठेला, ई-रिक्शा चालकों और मजदूरों से बातचीत की। ज्यादातर के पास आधार कार्ड नहीं थे। कुछ ने होने की बात स्वीकारी, लेकिन दिखा नहीं पाए। ये लोग भले ही शहर के सिस्टम का हिस्सा हैं, लेकिन सिस्टम से बाहर हैं। पूर्व में तो बांग्लादेश के नागरिकों को जयपुर में आवास तक आवंटित हो चुके हैं।

प्रशासनिक लापरवाही
झुग्गी-बस्तियों और अस्थायी कॉलोनियों में रहने वाले लोगों का डेटा तैयार नहीं है। जिनकी संख्या ज्यादा ई-रिक्शा चालकठेला और फेरी वाले, कचरा बीनने वाले, निर्माण मजदूर, फुटपाथ/झोपड़-पट्टी निवासी

जहां-जहां फैली आबादी
-सांगानेर, झोटवाड़ा, विश्वकर्मा, सीकर रोड, आगरा रोड, दिल्ली रोड

पहचान और मैपिंग जरूरी
कच्ची बस्तियों और झोपड़-पट्टियों से लेकर अन्य सभी की पहचान करना जरूरी है। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर मैपिंग और फील्ड ऑडिट करवाया जाए, ताकि यह पता चल सके कि शहर में कितने लोग बिना आधार के रह रहे हैं और वे कहां से आए हैं।

पुलिस सत्यापन में मुश्किल
बिना आधार और पहचान के रह रही आबादी पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। किसी अपराध की स्थिति में संदिग्ध की पहचान, उसके पिछले रिकॉर्ड और ठिकानों की जानकारी जुटाना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में आरोपी या संदिग्धों के पास कोई वैध पहचान पत्र नहीं होता। ऐसे में झुग्गी-बस्तियों, निर्माण स्थलों और किराए के इलाकों में सत्यापन पर जोर देना जरूरी है।

कितने हैं ‘बिन पहचान’ लोग?
जयपुर में बिना आधार या अधूरी पहचान के रह रहे लोगों की सटीक संख्या किसी भी विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। प्रशासन के पास कोई डेटा नहीं है। झुग्गी-बस्तियों, अस्थायी कॉलोनियों और निर्माण स्थलों में नियमित सर्वे नहीं होने से यह संख्या धुंधली बनी हुई है।विशेषज्ञों की राय

जानकारों का कहना है कि जब तक पूरे शहर का व्यवस्थित सत्यापन नहीं होगा, तब तक न तो सुरक्षा एजेंसियों की चिंता दूर होगी और न ही वास्तविक जरूरतमंद लोगों को योजनाओं का लाभ मिल पाएगा।