
जयपुर। होली नजदीक आते ही जयपुर के बाजार रंगों से भरने लगे हैं। मनिहारों के रास्ते में इन दिनों रजवाड़ी गुलाल गोटों की खूब बिक्री हो रही है। ये गुलाल गोटे देखने में सुंदर होते हैं और होली के मौके पर सूखे रंग के साथ इस्तेमाल किए जाते हैं। लोग इन्हें परंपरा और शौक के तौर पर खरीदते हैं। बाजारों में गुलाल गोटों की सजावट देखते ही त्योहार का माहौल बन जाता है।
जयपुर में मुस्लिम समुदाय के परिवार सात पीढ़ियों से गुलाल गोटा बनाने का काम कर रहे हैं। कारीगर अमजद खान बताते हैं कि उनके परिवार ने यह कला अपने बुजुर्गों से सीखी है। पहले यह काम राजाओं-महाराजाओं के लिए किया जाता था। समय के साथ यह परंपरा आम लोगों तक पहुंच गई। आज भी परिवार के बच्चे-बड़े सभी इस काम में हाथ बंटाते हैं। यह परंपरा मेहनत और हुनर से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
गुलाल गोटा बनाना आसान काम नहीं है। पहले लाख को पिघलाया जाता है। फिर उससे छोटे-छोटे गोल खोल तैयार किए जाते हैं। इन खोलों में सूखा गुलाल भरा जाता है और उन्हें सावधानी से बंद किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया हाथ से की जाती है। एक गुलाल गोटा हल्का होता है ताकि फेंकने पर किसी को चोट न लगे। कारीगरों के अनुसार एक दिन में सीमित संख्या में ही गुलाल गोटे बन पाते हैं, इसलिए होली से पहले मांग बढ़ते ही दबाव भी बढ़ जाता है।
होली नजदीक आते ही गुलाल गोटों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। दुकानदार बताते हैं कि इस बार लोगों में खासा उत्साह है। अधिकतर गुलाल गोटों की बुकिंग पहले ही हो चुकी है। मांग ज्यादा होने के कारण कई बार कारीगर समय पर पूरा माल तैयार नहीं कर पाते। इससे कीमतों में भी थोड़ा फर्क पड़ता है। फिर भी लोग परंपरागत गुलाल गोटे खरीदने के लिए दूर-दूर से आते हैं।
आज गुलाल गोटे सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं रहे। यह पारंपरिक कला देश के कई शहरों के बाजारों तक पहुंच चुकी है। कुछ गुलाल गोटे विदेशों में भी भेजे जाते हैं। कारीगरों के अनुसार जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी इनकी मांग है। गुलाल गोटा सिर्फ होली का रंग नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और साझा संस्कृति की पहचान भी है। मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाए गए गुलाल गोटे हिंदुओं के त्योहार में रंग भरते हैं। यही परंपरा जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल बनती जा रही है।
Updated on:
01 Mar 2026 12:06 pm
Published on:
01 Mar 2026 11:17 am
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