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Patrika Foundation Day: अखबार ऐसा हो, जिसमें समझौते नहीं करने पड़ें… तो बना पत्रिका

राजस्थान पत्रिका की निष्पक्ष पत्रकारिता के सफल 70 साल पूरे होने पर आप सब पाठकों के मन में एक सवाल जरूर कौंचता होगा कि आखिर कैसे पाठकों के अपने अखबार की नीव पड़ी? इसी सवाल का जवाब श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश ने अपनी आत्मकथ्य आधारित पुस्तक 'धाराप्रवाह' में विस्तार से दिया है। सवाल था-'पत्रिका' की परिकल्पना और परिणति के बीच कितना और कैसा फासला रहा?

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रिपोर्टिंग के शुरुआती दौर की कुछ घटनाओं के बाद मन में विचार स्थापित हो गया कि वास्तव में अखबार ऐसा होना चाहिए जो तमाम तरह के राजनीतिक दबावों से मुक्त हो। …मुझे यह अंकुश बर्दाश्त नहीं हुआ कि मैं क्या लिखता हूं इस पर कोई मेरे सामने बैठकर नजर रखे यह मेरी बर्दाश्तगी से बाहर था। मैं तय कर चुका था कि अब मुझे यहां काम करना ही नहीं है। अखबार से विदा ले ली। बस तभी से मन में बैठ गया कि अगर अपना कोई अखबार हो तो ऐसा हो…. जिसमें इस तरह के समझौते नहीं करने पड़ें। इसी के साथ 'पत्रिका' के जन्म का बीजारोपण हुआ।

अपने अखबार की परिकल्पना तो बन ही गई थी…। फिर मन में एक और विचार आया। अखबार निकलना शुरू हो, इससे पूर्व व्यापक दौरा कर लिया जाए… अश्वमेध यज्ञ की तरह। अपनी सीमाओं के विस्तार की कोई लालसा मन में नहीं थी… पर यह बात जरूर मन में उठी कि राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में परिचितों से विचार-विमर्श के साथ-साथ पाठकों की रुचि का… आदतों का… अखबार में उन्हें क्या पढ़ने को चाहिए, इस तरह की बातों का आकलन भी हो जाएगा।

एक जिज्ञासा और थी। उस समय जितने भी अखबार निकलते थे… वह किसी-न-किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रश्य में या प्रभाव में थे। अखबार के साथ किसी राजनीतिक व्यक्तित्व की निकटता से.. जनता के मन में उस अखबार के प्रति वैसा ही दृष्टिकोण बन जाया करता है…. और पाठक खबरों को उसी दृष्टि से तौलना शुरू कर देते हैं। भई फलां अखबार तो फला खबर नहीं छायेगा… वह 'धारणा' अखबार को एक सीमा में बांध देती है… जो मेरी दृष्टि में अखबार के विस्तार और विकास में बाधक है। दूसरा नुकसान यह होता था कि राजनीतिक आका के पसंद की खबरों को छापने और नापसन्दगी की खबरों को रोकने… दोनों ही स्थितियों में कई महत्त्वपूर्ण खबरों से पाठक वंचित रह जाते थे। इसीलिए मेरे मन में गहरी धारणा बन गई थी कि अखबार ऐसा हो जो इन सभी प्रभावों और दबावों से मुक्त हो।

जिसकी एक अलग और स्वतंत्र पहचान हो और जो खबरों के मामले में दिल्ली के अखबारों के समकक्ष ही। इसी संकल्प की परिणति के लिए जिस तरह पुराने राजा लोग अश्वमेध यज्ञ करवाते थे…. मैं उद्योग पर्व पर निकल पड़ा संयोगवश सहजता से ही सब कुछ आगे बढ़ता रहा। एक दिन मन में अखबार का नाम क्लिक हुआ 'राजस्थान पत्रिका।' यह नाम सबको पसंद आया। मित्र एल.आर. पेंढारकर से टाइटल बनाने के लिए कहा। रामगोपाल जी आचार्य ने एक श्लोक सुझाया य एषु सुप्तेपू जागर्ति' यानी 'सोतों में जागते रहने वाला।' पेंढारकर जी ने एक मशाल और अगल-बगल में गेहूं की दो बालें लगाकर गोला-सा बना दिया और उसके ऊपर यह श्लोक भी लिख दिया। यह टाइटल मेरी कल्पनाओं के अनुरूप था। इस तरह सहजता से ही 'राजस्थान पत्रिका' का नामकरण हो गया।

अब चुनौती थी काम करने वाले साथियों की…… मुद्रा की और मुद्रणालय की। एक मित्र वे कानमलजी ढड्डा। उनके छोटे भाई धनजी की चौड़े रास्ते में छोटी प्रेस थी। वे अखबार के प्रकाशन के लिए मान गए, लेकिन टाइप मशीन खरीदने में असमर्थता प्रकट कर दी। उस वक्त शुभचिन्तक डिप्टी सैक्रेटरी कन्हैयालाल जी ने 500 रुपए की मदद की। उन रुपयों से हमारी समस्या सुलझ गई। वहीं प्रेस के गलियारे में दो कुर्सी, एक टेबल, एक टाइप मशीन और ढाई आदमियों का साथ लेकर दो पैसे मूल्य वाली एक शीट की टेबुलर साइज की 'राजस्थान पत्रिका' रूपी कागज़ की नाव पत्रकारिता के महासमुद्र में शुभकामनाओं और आशीर्वाद के चप्पुओं के बल पर तैरने निकल पड़ी।

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