
अपने में पुरासभ्यता को समेटे राजसमंद जिले के पछमता गांव के बारे में अब स्कूलों में पढ़ाया जाएगा। जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर बनास किनारे स्थित यह गांव खुदाई के दौरान प्राप्त पुरावशेषों के लिए जाना जाता है।
इस सत्र के पाठ्यक्रम में कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में पछमता की सभ्यता की चित्रात्मक जानकारी सम्मिलित की गई है।
पछमता रेलमगरा उपखण्ड में बनास से डेढ़ किमी दूरी पर स्थित है। बनास किनारे गिलूण्ड में पहले से ही सिंधु घाटी सभ्यता से पहले के अवशेष मिले हैं।
विगत कुछ वर्षों से पछमता में भी पुरातात्विक विभाग के निर्देश में खुदाई चल रही है। यहां हड़प्पा सभ्यता के समकालीन कांस्ययुगीन सभ्यता के अवशेष मिले।
पहले बनास के क्षेत्र को आहाड़ सभ्यता के नाम से जाना जाता था, लेकिन अब इसे इतिहास में आहाड़-बनास सभ्यता कहा जाता है। राज्य में बनास को वन की आशा के नाम से भी जाना जाता है।
ये पढ़ेंगे विद्यार्थी
उदयपुर से 100 किमी दूर पछमता गिलूण्ड के पास स्थित है। आहाड़-बनास संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्थल है।
यह सभ्यता हड़प्पा सभ्यता के समकालीन है। आहाड़ सभ्यता 3000-4000 ईसवी पूर्व एक कांस्ययुगीन सभ्यता थी, जिससे हड़प्पा के साथ व्यापारिक संबंध थे।
यहां कई कलात्मक वस्तुएं जैसे नक्काशीयुक्त जार, बर्तन, सीप की चूडिय़ां, टेराकोटा मनके, शंख और जवाहर जैसे की लेपिस ले जुली, यह अद्र्धकीमती पत्थर अफगानिस्तान के बदख्शां में पाया जाता है।
नीले रंग का बहुमूल्य पत्थर, कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन और दो भट्टियां/चूल्हे मिले हैं। राजस्थान में कई पूर्व हड़प्पाकालीन स्थल हैं, जैसे कालीबंगा, करनपुरा, बिजनौर और तरकनेवाला डेरा। ऐसे 100 पुरास्थल मिले हंै, जिनमें पछमता एक है। इनमें से 6 का उत्खनन हो चुका है।
बढ़ेगा रुझान
डेक्कन कॉलेज, पुणे के प्रोफेसर डॉ. प्रबोध शिरवलकर का कहना है कि स्कूली पाठ्यक्रम में पछमता को जगह देने से बालकों में पुरातत्वस्थलों के प्रति रुझान बढ़ेगा। गिलूण्ड सभ्यता का ही यह एक भाग है। इस सभ्यता में कृषि से जुड़े पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं।
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