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कविता-एक चिडिय़ा

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कविता-एक चिडिय़ा

कविता-एक चिडिय़ा

डॉ. नवीन दवे मनावत

एक चिडिय़ा
रोज दस्तक देती है मेरे दरवाजे पर
और मर्म शब्दों में कहती है
मेरा आशियाना कहां है?

मैं निशब्द होकर
देखता रहता हूं
उसकी द्रवित आंखों को
मौन अधर और मौन हृदय
निर्लज हो गया मेरा

मैं चिडिय़ा के
प्रश्न का गहन अनुसंधान करने लगा
आखिर क्या रिश्ता है?
इस प्रश्न का मानव से!
जो हर बार करता है
प्रकृति समूह ।

लगाव मानव का है
प्रकृत्योचित बनने का
और उसका संहार करने का
और एक प्रश्न की ओर
हमेशा लालायित रहने का
कि उसका आशियाना कहां है?

आशियाना कहां है?
उजाड़ किसने दिया?
नहीं है उत्तर किसी के पास
यह प्रश्न जारी रहेगा
जब तक मानव नहीं जोड़ता
रिश्ता प्रकृति से

---------------

दिशा अबोध है

आज हम जिस धरातल पर खडे हैं
पता भी है कितने सुरक्षित हैं?
और कितने अस्तित्वशाली!

रोज एक विडंबना!
जीवन की उलझान सुलझाने से पहले
नई कोई विडंबित बात हो जाती है।

आज हमारी धमनियां और शिराएं
अवरूद्ध हो गई हैं
रुक गई है उसमें धड़कने की गति
विलासिता का कोलेस्ट्रोल
धंस गया है उसमें
जिससे रुक कर धड़कती सांसें!
बेजान- सी जिजीविषाओं को पाना चाहते हैं

कू्रर रक्त सी, मवाद सी विचारधारा
जिससे बनाना चाहते हैं
अभेद किला,
जिसे मजबूत नहीं
खंडहर कहां जाएं
जहां कोई विद्रोही नहीं हमला करता
बस बेबस राज्य स्थापित हो जाता है

हमारी मन स्थिति बन गई है
उस मछली-सी कमजोर
जो क्षीण हो जाती है जलाभाव से
कायरों की तरह

पर मृत्यु से रक्षित अप्रत्याशित
उस मछली की आशा
जो बुनना चाहती है
अपने ही प्रज्ञाचक्षु से
संभावनाओं के रक्षित जाल को!
हम यह जरूर कर सकते हैं

हम खोज रहे हैं
एक प्रलोभन का अस्तित्व
अपने भीतर यत्र-तत्र
पर दिशा अबोध है।


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