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कविता-पाती

Hindi poem

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कविता-पाती

कविता-पाती

प्रभा श्रीवास्तव बच्चन

मेरी अपनी, सुनो न,
तुमको भेज रहा हूं मैं प्रेमभरी पाती,
एक बार तुम भी कह दो न,
मेरे बिन तुम भी नहीं रह पाती।

अकसर तुम्हारी बहुत याद आती है,
हर पल मुझाको तड़पाती रहती है।

रात दिन मेरे तो तन्हा कटते रहते हैं,
बस तुम्हारी यादों में हम भटकते रहते हैं।

सूनी सूनी रहती हैं तुम बिन हमारी रातें,
जाग जाग कर याद करते हैं तुम्हारी मीठी मीठी बातें।

इतनी सी इल्तिजा है एक बार तो आजाओ न,
सारे गिले शिकवे भुलाकर मेरी हो जाओ न।

आ भी जाओ की एक दूजे के हो लें हम,
प्रेम रंग में रंग कर,एक रंग हो लें हम।।

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डॉ. नवीन दवे मनावत

एक चिडिय़ा

एक चिडिया
रोज दस्तक देती है मेरे दरवाजे पर
और मर्म शब्दों में कहती है
मेरा आशियाना कहां है?

मैं निशब्द होकर
देखता रहता हूं
उसकी द्रवित आंखों को
मौन अधर और मौन हृदय
निर्लज हो गया मेरा

मैं चिडिया के
प्रश्न का गहन अनुसंधान करने लगा
आखिर क्या रिश्ता है?
इस प्रश्न का मानव से!
जो हर बार करता है
प्रकृति समूह ।

लगाव मानव का है
प्रकृत्योचित बनने का
और उसका संहार करने का
और एक प्रश्न की ओर
हमेशा लालायित रहने का
कि उसका आशियाना कहां है?

आशियाना कहां है?
उजाड़ किसने दिया?
नहीं है उत्तर किसी के पास
यह प्रश्न जारी रहेगा
जब तक मानव नहीं जोड़ता
रिश्ता प्रकृति से

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