
गीत-सर्दी तू बेदर्दी है,गीत-सर्दी तू बेदर्दी है
नरेन्द्र सिंह नीहार
कंपा-कंपा कर तूने मेरी,
हालत पतली कर दी है।
सर्दी तू बेदर्दी है!
शीत लहर खाती हिचकोले,
खूब जमें बर्फ के गोले।
पर्वत घाटी मैदानों में,
नागिन जैसी नित उठ डोले।
पहरेदारी काम हमारा,
फटी पुरानी वर्दी है।
सर्दी तू बेदर्दी है!
आसमान में धुंध चढ़ी है,
धूप दिखे न एक घड़ी है।
थर - थर कांपें दादी अम्मा,
हिलती डुलती खूब छड़ी है।
छींक-छींक औ खांस-खांस,
हुई रुआंसी जर्दी है।
सर्दी तू बेदर्दी है!
कम्बल गद्दे और रजाई,
लाऊं कहां से मेरे भाई।
एक कोने में छुपकर बैठे,
ठिठुर - ठिठुर कर रात बिताई।
किसे सुनाएं अपना दुखड़ा,
मौसम ये खुदगर्जी है।
सर्दी तू बेदर्दी है!
पढ़ें यह कविता भी
सिर झुकाना छोड़ दो
आदिज्योति बाजपेई
तर्क खुद से मत करो, व्यवधान होगा
कल्पना में सत्य पाना छोड़ दो !
रक्त के आंसू बहे हैं
नित्य दृग के कोर से,
पृष्ठ संख्या में गढ़े हैं
हर दिशा की ओर से ,
मत विकल्पों से डरो, निष्कर्ष होगा
तीक्ष्ण घावों से डराना छोड़ दो!
श्वास का होगा वरण तब
फिर ज्वलित होगी प्रभा ,
और धर भी मुक्त होगी
तिमिर - चुम्बन राग से,
ले चलो अवरोध सा, परिणाम होगा
दांव पर जीवन लगाना छोड दो!
क्षेत्र का परिधान पहनो
हार से शृंगार हो,
और घूंघट में नहीं
उल्सित नयन में धार हो ,
शून्य बनकर अंक का अनुमान होगा
अब नया कोई बहाना छोड़ दो!
घाव के आंचल तले
ढक लो हृदय के पीर को,
ढूंढ लो खुशियां गमों में
काट दो जंजीर को ,
मत कहो अब स्वप्न को आघात होगा
कल्पना में ही नहाना छोड़ दो!
क्यों छले हो प्राण को
मन के गहन उच्छवास में ,
बचपना खोया कहीं जा
वृद्ध के विश्वास में,
फिर थपेड़ों स कहीं दो चार होगा
हार से अब दिल लगाना छोड़ दो!
बांध लो फिर से नुपुर को
वेदना के उच्च स्वर में,
सो सकोगे चैन से तब
राख में जल खाक होगा ,
हार मत मानो बड़ा अपमान होगा
और अपना सिर
पढ़ें यह कविता भी
सिर झुकाना छोड़ दो
आदिज्योति बाजपेई
तर्क खुद से मत करो, व्यवधान होगा
कल्पना में सत्य पाना छोड़ दो !
रक्त के आंसू बहे हैं
नित्य दृग के कोर से,
पृष्ठ संख्या में गढ़े हैं
हर दिशा की ओर से ,
मत विकल्पों से डरो, निष्कर्ष होगा
तीक्ष्ण घावों से डराना छोड़ दो!
श्वास का होगा वरण तब
फिर ज्वलित होगी प्रभा ,
और धर भी मुक्त होगी
तिमिर - चुम्बन राग से,
ले चलो अवरोध सा, परिणाम होगा
दांव पर जीवन लगाना छोड दो!
क्षेत्र का परिधान पहनो
हार से शृंगार हो,
और घूंघट में नहीं
उल्सित नयन में धार हो ,
शून्य बनकर अंक का अनुमान होगा
अब नया कोई बहाना छोड़ दो!
घाव के आंचल तले
ढक लो हृदय के पीर को,
ढूंढ लो खुशियां गमों में
काट दो जंजीर को ,
मत कहो अब स्वप्न को आघात होगा
कल्पना में ही नहाना छोड़ दो!
क्यों छले हो प्राण को
मन के गहन उच्छवास में ,
बचपना खोया कहीं जा
वृद्ध के विश्वास में,
फिर थपेड़ों स कहीं दो चार होगा
हार से अब दिल लगाना छोड़ दो!
बांध लो फिर से नुपुर को
वेदना के उच्च स्वर में,
सो सकोगे चैन से तब
राख में जल खाक होगा ,
हार मत मानो बड़ा अपमान होगा
और अपना सिर झाुकाना छोड़ दो !
Published on:
29 Jan 2022 08:07 pm
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