
मुंबई. श्री ठाकुरद्वार जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मास के दौरान श्रीपती ज्वेल्स पर्ल ई-विंग आदेश्वर भवन में विराजित साध्वी भव्यगुणा ने दुआ और प्रार्थना के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का आयोजन सुलसा ग्रुप द्वारा किया गया। साध्वी भव्यगुणा ने कहा कि जैन धर्म में दुआ को भाव और आशीर्वाद के रूप में देखा जाता है। सच्चे मन से की गई प्रार्थना मन का बोझ हल्का करती है तथा भय, चिंता और क्रोध को शांत कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। गुरु के आशीर्वाद से समाज को भी आत्मबल मिलता है। उन्होंने कहा कि प्रार्थना करते समय अहंकार कम होता है और विनम्रता बढ़ती है। दूसरों के कल्याण की भावना मन में करुणा पैदा करती है। जैन दर्शन के अनुसार प्रार्थना नए कर्मों का निर्माण नहीं करती, लेकिन पुराने कर्मों के कष्ट सहने की शक्ति अवश्य प्रदान करती है। साध्वी ने कहा कि प्रार्थना केवल मांगना नहीं, बल्कि परमात्मा की इच्छा के प्रति समर्पण है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:’ की भावना ही सच्ची दुआ है। ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को अपनाते हुए सभी जीवों के सुख, शांति, समता और सद्बुद्धि की कामना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी पवित्र भावना व्यक्ति, समाज और संसार को बेहतर बनाने की शक्ति रखती है।
Updated on:
19 Aug 2026 11:54 am
Published on:
19 Aug 2026 06:01 am
