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राज्यसभा में पलकों पर बैठाया, राष्ट्रपति चुनाव में नहीं​ मिला भाव, खिसियाए घूमते दिखे कुछ विधायक

राष्ट्रपति चुनाव में हार्स ट्रेडिंग नहीं होने से विधायकों के भाव जमीन पर, मान-मनोव्वल नहीं हुई, खिसियाए घूमते दिखे कुछ विधायक

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राज्यसभा में पलकों पर बैठाया, राष्ट्रपति चुनाव में नहीं​ मिला भाव, खिसियाए घूमते दिखे कुछ विधायक

हरेन्द्रसिंह बगवाड़ा / जयपुर। कुछ छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के साथ भी खूब हुई। उन्हें उम्मीद थी कि जिस तरह से राज्य सभा चुनाव के दौरान उनको सरकार ने पलकों पर बिठाए रखा था। राष्ट्रपति चुनाव में भी उनके साथ वैसा ही सलूक होगा, लेकिन हुआ एक दम उलट।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही इन विधायकों को भाव नहीं दिए। हालत यह थी कि मतदान से पूर्व देर रात तक कुछ विधायक तो इस बात का जुगाड़ करते दिखे कि पार्टी का कोई बड़ा पदाधिकारी उन्हें अपने पक्ष में मतदान करने का आग्रह ही कर दे। ताकि इज्जत बची रहे।


राज्य में करीब बीस विधायक ऐसे हैं, जो छोटे दलों से आते हैं, या निर्दलीय चुनाव जीते हुए हैं। शुरू से ही बहुमत का आंकड़ा इनके इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। दो साल पूर्व सत्ताधारी दल में विधायकों की बगावत होने के बाद तो इन विधायकों की पांचों अंगुलियां घी में आ गई। पहले सरकार बचाने के लिए फिर राज्यसभा चुनाव के दौरान हुई बाड़ाबंदी के दौरान इनमें से ज्यादातर ने जमकर लुत्फ उठाया।

सरकार ने भी इनकी खूब गरज की। इनके गाए-गाए सब पूरे किए। सरकार की मजबूरी का फायदा उठाने के बाद इन्हें इस बार भी उम्मीद थी कि राष्ट्रपति चुनाव में इनकी फिर पूछ होगी, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के समीकरण ऐसे बने कि इनके वोट देने या नहीं देने से उम्मीदवारों की जीत हार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। वैसे भी राष्ट्रपति चुनाव में पार्टियां व्हिप जारी नहीं करती और मतदान भी गुप्त रखा जाता है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्थिति भांप कर पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी विचारधारा के आधार पर यह चुनाव लड़ रही है। इसे जीत-हार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।


भाजपा ने खेला दाव

भाजपा ने आदिवासी महिला पर ऐसा दाव खेला कि कुछ राज्यों की गैर भाजपा सरकारें तक उनके पाले में आ गई। भाजपा जीत के प्रति इतनी आश्वस्त थी कि उन्होंने किसी को भाव नहीं दिए। बीस में से करीब आधे विधायक ऐसे हैं जिनका जनाधार ही आदिवासी वोटर हैं। ऐसे में वे मतदान का बहिष्कार करने की स्थिति में भी नहीं थे। देर रात तक यह प्रयास चलते रहे कि किसी तरह इज्जत बच जाए। हालांकि मतदान नहीं करने वाले दो विधायकों में से एक आदिवासी विधायक था। उसने यह कह कर पीछा छुड़ाने में भलाई समझी कि पारिवारिक कारणों से वह मतदान में हिस्सा नहीं ले पाया। जबकि संयम लोढ़ा समेत कुछ गिने-चुने निर्दलीय विधायक ऐसे भी थे, जो कांग्रेस विधायक दल की बैठक में नदारद रहने के बावजूद पहले दिन से गहलोत के खेमे में खड़े़ रहे।

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