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पृथ्वीराज चौहान व संयोगिता भी बने थे कभी इक-दूजे के वेलेन्टाइन

तब कोई टेलीफोन था ना कोई मोबाइल। पोस्टकार्ड और ई-मेल की सुविधा भी नहीं थी। वह संयोगिता की प्रेम अगन ही थी जो सम्राट पृथ्वीराज चौहान को खींचकर अजमेर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कन्नौज ले गई।

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ajay yadav

Feb 15, 2016

तब कोई टेलीफोन था ना कोई मोबाइल। पोस्टकार्ड और ई-मेल की सुविधा भी नहीं थी। वह संयोगिता की प्रेम अगन ही थी जो सम्राट पृथ्वीराज चौहान को खींचकर अजमेर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कन्नौज ले गई। अजमेर और तारागढ़ का नाम पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता से जुड़ा हुआ है।

दुर्भाग्यवश चौहान की नगरी अजमेर में उनके प्यार की कोई निशानी नहीं है, लेकिन चौहान और संयोगिता का प्रेम आज भी प्रेमी युगलों के बीच मिसाल है। चित्र देखकर हुआ प्रेमइतिहासकारों के अनुसार कन्नौज में एक चित्रकार पन्नाराय के पास दुनिया के शासकों के चित्र थे।

उनमें से एक चित्र पृथ्वीराज चौहान का था। कन्नौज की युवतियों ने जब पृथ्वीराज चौहान के चित्र को देखकर उनकी सुंदरता का बखान किया तो कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता भी खुद को रोक नहीं सकी। पृथ्वीराज के चित्र को देखकर ही संयोगिता ने उन्हें अपना पति मान लिया।

चित्रकार पन्नाराय ने दिल्ली पहुंचकर जब संयोगिता का चित्र पृथ्वीराज चौहान को दिखाया तो उन्हें भी संयोगिता से प्रेम हो गया। जयचंद, पृथ्वीराज को पसंद नहीं करते थे, इसलिए संयोगिता के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में उन्होंने विभिन्न राज्यों के राजकुमारों को बुलाया, उसमें पृथ्वीराज चौहान आमंत्रित नहीं थे।

प्रतिमा को पहनाई माला
इतिहासकारों का मानना है कि स्वयंवर में चौहान की मूर्ति को द्वारपाल की जगह खड़ा कर दिया गया था। संयोगिता वरमाला लेकर बाहर आई तो वहां मौजूद राजकुमारों में पृथ्वीराज को नहीं देखकर उन्हें दुख हुआ। कोने में खड़ी पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को देखकर संयोगिता मूर्ति को माला पहनाने के लिए आगे बढ़ी। तभी सम्राट पृथ्वीराज मूर्ति की जगह आकर खड़े हो गए। संयोगिता ने माला पृथ्वीराज के गले में पहना दी। इससे खफा जयचंद तलवार लेकर पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता को मारने के लिए दौड़े, लेकिन पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर वहां से निकल गए।

इतिहासकारों में मतभेद
इतिहास के सेवानिवृत्त व्याख्याता ओ.पी. शर्मा का मानना है कि चौहान और संयोगिता के बीच प्यार तो था, लेकिन इसको लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं कि चौहान ने कन्नौज पर आक्रमण कर संयोगिता का अपहरण किया था या दोनों का विवाह हुआ।

केवल पृथ्वीराज रासो में ही इसका उल्लेख है कि पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता का अपहरण किया। इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा इसका समर्थन तो करते हैं, लेकिन आधार की दृढ़ता उन्होंने ने भी नहीं दी है। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि तराइन के पहले युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता का अपहरण किया था, लेकिन इस पर सर्वसम्मत विश्वास किसी का भी नहीं है।

इसलिए पड़ा था घूघरा नाम
इतिहासकारों की मानें तो संयोगिता को कन्नौज से अजमेर लाते समय संयोगिता की पायल का एक घूंघरू रास्ते में गिर गया। पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सेना को घूंघरू ढूंढने भेजा, जहां घूंघरू मिला उस जगह का नाम घूघरा पड़ गया। हालांकि इसे लेकर भी इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं।