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अर्जुन के तीर से निकली थी रामगढ़ बांध की बाण गंगा

रामगढ़ बांध को पवित्र जल से भरने वाली बाण गंगा का उद्गम महाभारत काल में हुआ। 74 साल तक गंगा जैसे पवित्र व ऊर्जावान गंगा जल का आचमन करने का जयपुर को सौभाग्य मिला। इस बांध ने 1931 से 2005 तक जयपुर को जल पिलाया।

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arjun ban ganga river

जितेन्द्र सिंह शेखावत
रामगढ़ बांध को पवित्र जल से भरने वाली बाण गंगा ( Banganga River History ) का उद्गम महाभारत काल में हुआ। 74 साल तक गंगा जैसे पवित्र व ऊर्जावान गंगा जल का आचमन करने का जयपुर को सौभाग्य मिला। इस बांध ( Ramgarh Dam History ) ने 1931 से 2005 तक जयपुर को जल पिलाया। महान धनुर्धर अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र शस्त्रों को गंगा जल से शुद्ध करने के लिए बैराठ के पास मैड़ के जंगल की धरती में तीर चलाकर मां गंगा को आहूत कर प्रवाहित किया था। इस वजह से य ह नदी आदिकाल से बाण गंगा नाम से प्रसिद्ध हैं।

आजादी के पहले तक यह नदी बारह महीने बहती थी। मैड़ में बाण गंगा तट पर मेला भरता, जिसमें हजारों लोग इसके गंगा समान पवित्र जल का आचमन कर धन्य होते थे। बाण गंगा के उद्गम स्थल पर राधेकांत जी के पांडव में मंदिर में विराजमान धर्मराज युधिष्ठर, गदाधारी भीम, धनुर्धर अर्जुन, पराक्रमी सहदेव व नकुल के अलावा द्रोपदी की अति दुर्लभ पौराणिक मूर्तियों की आज भी पूजा होती है।

सर्पधारी गरुड़, कपासन माता, गणेश, हनुमान, कार्तिकेय के अलावा एकादश शिव ज्योतिर्लिंग भी है। कहते है रावण के पिता विसश्रुआ ने इन पहाडिय़ों में तपस्या की थी। पांडवों ने वेश बदलकर राजा विराट के राज्य में वनवास बिताया तब उन्होंने बाणगंगा उद्गम स्थल के शमी वृक्ष पर अपने दिव्य अस्त्र शस्त्रों को छुपाया था। वनवास पूरा होने के बाद अर्जुन ने छुपाए दिव्य अस्त्र शस्त्रों को गंगा जल से शुद्ध करने का संकल्प कर लिया था। तब अर्जुन ने शमी वृक्ष के पास ही गंगा मैया आह्वान किया और धरती में तीर चलाया तब गंगा मैया वहीं पर प्रवाहित हो गई थीं।

सवाई जयसिंह और रियासत के प्रधानमंत्री नंदराम हल्दिया की इस पांडव मंदिर के प्रति गहरी आस्था रही। उन्होंने मंदिर भोग के लिए तेवड़ी, सेवरा, ज्ञानपुरा की जागीर का पट्टा दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास भी भक्त शिरोमणि गोपालदास के पास मैड़ में आए और उन्होंने पवित्र बाण गंगा में स्नान किया। गुरु रामदास की पादुकाएं संत गोपालदास के पास पूजा में रही। बरसों तक यह पादुकाएं जयपुर के बालानंद मठ में भी रही।

गुरु रामदास से प्रेरित हो मैड़ के संत गोपालदास व उनके भाई माधवदास ने औरंगजेब के मंदिर तोड़ो अभियान का विरोध कर अपना बलिदान कर दिया था। उनके वंशज सजह राम ने नृसिंह मंदिर बनवाया और स्वामी बालमुकंद हिमालय में तपस्या करने चले गए। बालानंद मठ से जुड़े देवेन्द्र भगत के मुताबिक इस वंश में महात्मा रामचन्द्र शर्मा वीर ने गोरक्षा आंदोलन में भाग लिया। महात्मा रामचन्द्र ने बालानंद मठ में रखी गुरु रामदास की चरण पादुकाओं को स्थापित किया। आचार्य धर्मेन्द्र ने इस पंच पीठ को देश में प्रसिद्ध किया।