
जयपुर।
हाईकोर्ट की अवमानना करने के लिए लोगों को उकसाने वाले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष और विधायक अशोक परनामी अपने रवैये को लेकर मंगलवार को फिर घिर गए। सेठी कॉलोनी में मंगलवार को नगर निगम की तोडफ़ोड़ की कार्रवाई के दौरान प्रभावित पक्ष ने आरोप लगाया कि स्थानीय विधायक अशोक परनामी के समक्ष उसने गुहार लगाई लेकिन सुनवाई नहीं हुई। उलटे रसूखदार को पता चल गया और वह प्रभावित पक्ष को धमकाने लगा।
यह है मामला, जो अपने आप में अटपटा
हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना कर जगह-जगह अवैध इमारतें खड़ी हो रही हैं लेकिन नगर निगम इन्हें छोड़कर पहले सेठी कॉलोनी में उस जगह पहुंचा, जहां केवल 10 फीट चौड़ा निर्माण हटाना था। वहां एक धार्मिक स्थल के पास केवल 10 फीट चौड़ा निर्माण हटाना था, जिसमें निगम के दस्ते को 5 घंटे लग गए।
हैरत की बात यह है कि इस मामले में कोर्ट का फैसला 7 साल पहले आया था लेकिन कार्रवाई की सुध अब ली गई। इसके लिए कोर्ट के उस आदेश की गलत तरीके से व्याख्या की गई, जिसमें नगर निगम को विधिक प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा गया था। निगम ने नोटिस दिया लेकिन जवाब में दिए गए मालिकाना हक के दस्तावेजों का पूरी तरह परीक्षण भी नहीं किया गया। यहां तक कि वक्फ बोर्ड के भी जमीन पर मालिकाना हक के दावे को अनसुना कर दिया गया।
बातचीत के बहाने बुलाया, कर लिया गिरफ्तार
ट्रांसपोर्टनगर थाना पुलिस प्रभावित लोगों को बातचीत के बहाने थाने ले गई। वहां एसएचओ के कमरे में तब तक बन्द रखा, जब तक कि कार्रवाई नहीं हो गई। इस बीच उन्हें शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
सवाल, जिनके जवाब में छुपी है असलियत
- कोर्ट ने वर्ष 2010 में नगर निगम को इस मामले में विधिक प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा। निगम को 7 वर्ष बाद इस आदेश की याद आई। इसके लिए उस शिकायत पत्र को आधार बनाया गया, जो कोर्ट के आदेश के ७ वर्ष बाद निगम में पहुंचा। आखिर इतना समय क्यों लगा?
- विधिक प्रक्रिया के तहत नोटिस देने की औपचारिकता तो निभाई लेकिन प्रभावित ने मालिकाना हक के दस्तावेज दिखाए तो उसके परीक्षण की पूरी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई?
- केवल 10 फीट चौड़ा कमरा हटाना था, वहां काबिज लोग भी सामान्य तबके से हैं। ऐसे में कार्रवाई के लिए निगम के सतर्कता उपायुक्त बाघसिंह, मोतीडूंगरी जोन उपायुक्त अशोक योगी, सतर्कता निरीक्षक नरेश शर्मा, निगम सतर्कता शाखा सहित पुलिस का जाब्ता तैनात किया गया। ऐसा तो मौके पर कुछ था ही नहीं, जिसके लिए इतना बड़ा लवाजमा ले जाने की जरूरत पड़ी जबकि मौके पर कार्रवाई करीब 10 मिनट में पूरी हो गई।
- मोतीडूंगरी जोन उपायुक्त और सतर्कता उपायुक्त 4 घंटे तक तो फोन करते रहे। वह लगातार महापौर से लेकर आयुक्त से संपर्क में रहे। महापौर ने संबंधित अधिकारी को फोन भी लगाया लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ।
- नक्शे में यहां 60 फीट चौड़ी सड़क दर्शाई गई है तो निगम ने केवल 10 फीट चौड़ाई में ही कार्रवाई क्यों की?
प्रभावितों का परनामी पर आरोप, निगम ने नकारा
- प्रभावित महेन्द्र जैन का आरोप है कि पड़ोस में धार्मिक स्थल से जुड़े एक पदाधिकारी के कहने पर स्थानीय विधायक अशोक परनामी के दबाव में कार्रवाई हुई।
- जैन ने कहा कि वह और उनकी बेटी परनामी से मिलने गए लेकिन उन्होंने सुनवाई नहीं की। उलटे एक रसूखदार व्यक्ति तक जानकारी पहुंच गई। इसके बाव रसूखदार उन पर कोर्ट नहीं जाने और ५ दिन में अपने स्तर पर निर्माण हटाने का दबाव डालने लगा। जबकि इस जमीन की डिक्री उनके पास मौजूद है। रजिस्ट्री वर्ष 1985 में चिरंजीलाल के नाम से है। यहां तक कि बीडीओ ने कोर्ट में लिखित पत्र पेश किया, जिसमें यहां पंचायत का पट्टा होना तस्दीक हुआ। हालांकि निगम अधिकारियों ने इसे नकार दिया।
मेरी जानकारी में नहीं है : परनामी
मामले और आरोपों को लेकर पत्रिका ने परनामी से बात की लेकिन उन्होंने 'मेरी जानकारी में नहीं है' कहकर फोन काट दिया। इसके बाद न कॉल रिसीव की, न मैसेज का जवाब दिया।
थानाधिकारी निरुत्तर
ट्रांसपोर्टनगर थानाधिकारी नरेश मीणा ने यह तो स्वीकार किया कि प्रभावित लोगों को पकड़ा, लेकिन यह नहीं बताया कि इसका कारण क्या रहा।
शिकायत के आधार पर कार्रवाई की गई। कोर्ट ने 2010 में विधिक प्रक्रिया अपनाने के आदेश दिए थे। लोगों से समझाइश करने में ज्यादा वक्त लग गया। दबाव किसी का भी नहीं था। आदर्शनगर, जवाहरनगर, जनता कॉलोनी व अन्य इलाकों में बन रही अवैध इमारतों पर भी कार्रवाई होगी।
- अशोक योगी, उपायुक्त, नगर निगम
Updated on:
22 Nov 2017 08:27 am
Published on:
22 Nov 2017 08:26 am
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