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किसान : राह कितनी आसान ?

देश का किसान छुट्टी पर है। जी हां किसान और छुट्टी पर...दशकों पुरानी समस्या लेकिन समस्याओं को दूर करने का दबाव बनाने का ये नया तरीका अजमाया जा रहा है।

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विशाल सूर्यकांत
देश का किसान छुट्टी पर है। जी हां किसान और छुट्टी पर...दशकों पुरानी समस्या लेकिन समस्याओं को दूर करने का दबाव बनाने का ये नया तरीका अजमाया जा रहा है। जब किसान शहरों में नहीं जाएंगे लेकिन खरीददार गांव में आएंगे तो स्वागत होगा। राष्ट्रीय किसान महासंघ के साथ 130 संगठन इसमें शामिल है और दावा ये किया जा रहा है कि ये आंदोलन न सिर्फ प्रभावी होगा बल्कि निर्णायक भी होगा।

दरअसल, किसानों के नाम पर इस देश में राजनीति और आंदोलन इतने हो चुके हैं कि किसान नेताओं के दावे और सरकारों की मंशा हमेशा से सवालों के घेरे में रहते हैं। अगर वाकई ऐसे आंदोलनों का प्रभाव रहा होता या सरकारें वाकई किसान हितैषी होती तो देश में किसान आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं होता।

कौन होगा जो बेवजह अपनी जान गंवा दे, कौनसा तबका होगा जो सड़कों पर अपनी फसल पर खुद ट्रेक्टर चला दे, कौनसा ऐसा तबका होगा जो खुशहाली छोड़ कर बदहाली में रहना पसंद करता होगा। राजनीतिक दलों के दफ्तरों में जाता किसान, देश के नौकरशाहों ने जिसे बनाया वो किसान और सरकारी बजट में दिखता किसान। किसानों से ये चेहरे,एक दूसरे से बेहद अलग है। लेकिन हम बात कर रहे हैं आम किसान की,जो अपने गांव और खेत को ही दुनिया मानकर जीता है।

किसान,जो खेत की मेढ़ पर बैठा है। पहले राजनीति उसके आस-पास थी, वो जो कहता सब सुनती थी,समझती थी। राजनीति करीब थी तो सत्ता और नौकरशाही को भी चाहे-अनचाहे सुनना ही पड़ता था। लेकिन अब किसान का पहरा छोड़ राजनीति, सचिवालय की कुर्सियों में, किसान आयोग, बीज निगम जैसे ओहदों के इर्द-गिर्द घुमने लगी है गोया कि खेती-किसानी मानों इन्हीं ओहदों के रुबाब में जा बसी हो।

किसान आंदोलन या किसान राजनीति का मतलब ये हो रहा है कि नए किसान नेताओं की फसल लहलहाने वाली है। इसीलिए किसानों के नाम पर हो रहे आंदोलनों पर सवाल उठते हैं, सियासत होती है। कोई एक दल ही नहीं बल्कि हर राजनीतिक दल में किसान राजनीति, ओहदे और टिकटों तक सिमटने लगी है।

लोकतंत्र में आंदोलन, कितना सही या गलत ये पहले राजनीति और सरकारें तय करती हैं। बाद में जन समर्थन से इसका मकसद और हश्र दोनों तय हो जाया करता है। इसीलिए इस पर बात करने के बजाए आम किसान की पीड़ा और समस्याएं उजागर करना ज्यादा सार्थक लगता है। वाकई नेताओं की बातों पर यकीन कर लें तो मान लेना चाहिए कि देश में किसान खुशहाल हो चुका है और उसे कोई फिक्र नहीं।

लेकिन क्या ऐसा है ? राजनीतिक दल किसानों के नाम पर क्या वक्ती सियासत ज्यादा करते है ? आती-जाती सरकारें किसानों को लुभाने के लिए कभी कर्ज माफी का झुनझुना थमाती है तो कभी पानी-बिजली की तत्कालिक व्यवस्थाएं कर किसान वोट बैंक तैयार करने का जतन करती हैं। किसानों की मूल समस्याएं क्या है ये जानने की जहमत कौन उठाता है ? सरकारों को किसानों से या तो वोट चाहिए या विकास के लिए जमीन...।


अधिग्रहण की सरकारी तलवार किसानों के सिर पर लटका कर विकास की अपनी परिभाषाएं गढ़ ली जाती हैं। बीते दशकों में ये बात हम भूलने लगे हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि, देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है। हमने देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार में खेती-किसानी को काफी पीछे छोड़ दिया है। किसान शब्द से खुशहाली का भाव गायब होता जा रहा है। जिन परिवारों में युवा खेती-किसानी को अपनाते हैं,क्या वो सामाजिक सम्मान पा रहे हैं ?

शहरों में चाट का ठेला,पकौड़ा बेचने वाले काम स्टार्ट अप के रुप में सम्मान पा रहे हैं लेकिन खेती-किसानी उपेक्षित हैं। खेती-किसानी के बर्बादी की दास्तान इतनी सामने आ चुकी हैं कि मंडी कारोबारियों को लखपति-करोड़पति बनाने वाला किसानी का पेशा उपेक्षित है, आशंकाओं से घिरा हुआ है। किसान का नाम आते ही कर्ज,बर्बादी और आत्महत्याओं की खबरें जेहन में घूमने लगती हैं। क्या ये है किसानों का विकास ..?


इसी बात को आंकडों के नजरिए से समझ लीजिए, जनवरी,2018 में मोदी सरकार की ओर से दी गई आर्थिक सर्वे रिपोर्ट-2017-18 में बताया गया कि आज भी देश का 50 फीसदी मानव श्रम सिर्फ खेती-किसानी में लगा है लेकिन इस सेक्टर की जीडीपी में हिस्सेदारी महज 17-18 फीसदी है। 2018 से तुलना में आजादी के वक्त 1947 में स्थिति ये थी कि देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र 52% पर था।

शास्त्रों में लिखा और प्रचलित कहावतों में चला आ रहा है कि उत्तम खेती,मध्यम ब्यापार,अधम चाकरी,भीख निदान। लेकिन देश के आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि जीडीपी में सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी 55.2 फीसदी हो चुकी है और इसमें 2017-18 में 72.5% की ग्रोथ दिख रही है। भारत में 13.78 करोड़ कृषि जमीन धारकों में से 11.71 करोड़ छोटे और मध्यम किसान हैं। क्या किसान विकास की योजनाएं बड़े किसानों की दहलीज पार कर छोटे किसानों के खेतों तक पहुंच पाती है ? जबकि छोटे किसान, देश की खेती-किसानी को ऑक्सीजन दे रहे हैं। छोटे किसानों के पास पूंजी कम है और खेती की लागत बढ़ती जा रही है। बड़े किसानों की परेशानी की अलग दास्तान हैं मगर छोटा किसान तो वाकई बदहाल है, दयनीय स्थिति में है।

न संसाधन न साधन। खेतों में देश की महिलाओं की भूमिका और उनके योगदान को न तो आंका गया और न ही उस रुप में स्वीकारा गया। करीब 65 फीसीद महिला श्रम खेतों में काम आता है, लेकिन खेती में उनके नाम दस फीसदी जमीनें भी नहीं। सरकारें अगर कृषि विकास की बात करती हैं तो ये आंकडा भी जान लीजिए कि देश में कृषि निर्यात लगातार घट रहा है। साल 2013-14 में 42.9 अरब डालर का निर्यात था लेकिन 2016-17 में ये घटकर 33.4 अरब डालर का रह गया।

सरकार इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार का स्थिर रहने की दलील लेती है लेकेिन कृषि क्षेत्र में निर्यात घटना क्या दर्शाता है, ये समझना आसान है। देश में किसान खेती से पलायन कर रहा है, ये वो सच है जिस पर सरकारें राजनीतिक कारणों से रेखांकित करने से बचती हैं।

किसानों के पास अपनी पूंजी नहीं,सरकारी सिस्टम में कितनों को लोन मिल पाता है, कितने किसान बैंकों तक पहुंच पाते हैं, कई सवाल हैं जो खेती-किसानी का व्यावहारिक पहलू हैं। देर-सबेर गांव का साहूकार सूदखोरी में लपेटा हुआ कर्ज देता है, फसल हो जाए तो बिकवाली के लिए बाजार में बिचौलिया आ जाता है। खेत से मंडी तक फसल,अनाज पहुंचाता किसान न जाने कितने हाथों में घूमता रहता है।

समर्थन मूल्य पर खरीद की सरकारी घोषणा में सीमा तय है, खरीद तय है। मंडियों में कौड़ियों के दाम लगाकर करोडों में बेचने का खेल चलता है। ज्यादातर मामलों में किसान को लागत पर मुनाफा न तो सरकार दे पाती है और बाजार। फसल कुदरती कारणों से तबाह हो जाए तो ड्यादातर मामलों में 50 फीसदी खराबे पर मुआवजा देने की सीमा तय कर दी जाती है और नुकसान का आंकलन करने का तरीका भी बड़ा अजीब है।

हैरानी की बात है कि मंगल और चांद के अभियान चलाने वाले भारत में सेटेलाइट टेक्नोलॉजी दुनिया के लिए मिसाल है लेकिन गांव में फसलों की बर्बादी का आंकलन करने के लिए न जमीन पर कोई तरीका है और न आसमान की निगरानी का तरीका। गांव में कहावत है कि उपर करतार,नीचे पटवार..।

पटवारी,गिरदावर का रिपोर्ट लेने का तरीका है आंखों देखा हाल।...पटवार,गिरदावर जो कह दे, वो जो लिख दे सरकार उसी की सुनेगी। जो पीड़ित किसान है वो कितना नुकसान हुआ,ये सरकार को बताने के लिए पटवारी,गिरदावर की आंखों देखी रिपोर्ट का मोहताज है।


परेशानियों से जूझते किसानों में हताशा बढ़ती जा रही है और वो परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार की संवेदनाओं का आलम देखिए कि किसान आत्महत्या के आंकडे कहीं ज्यादा सियासी पेचीदगियों में न फंसाएं, इसीलिए सरकारों ने नया इंतजाम कर लिया है। जब से किसान आत्महत्याओं से जुड़ा दर्दनाक मानवीय पहलू, राजनीति के हत्थे चढ़ा है। सरकारों ने इन मामलों को दबाने की रवायत शुरु कर ली है।


आंकडोें का हेर-फेर करने में आसानी हो, इसके लिए सरकारी सिस्टम में नया फॉर्मेंट बना लिया। किसानों की आत्महत्या के मामलों में एक नई कैटेगरी और सब-कैटेगरी बना ली गई। खेल समझिए, नई व्यवस्था के मुताबिक जमींदार किसान, ठेके पर खेती करने वाले किसान और खेतिहर मजदूर। हालांकि एनसीआरबी का कहना है कि कोई नया वर्ग नहीं बनाया बल्कि पुरानी सूची में मामूली बदलाव किया है। लेकिन इस बदलाव का असर क्या हो रहा है, ये जरूर आपको समझना चाहिए।

एनसीआरबी के मुताबिक नए सिरे से कोई नया वर्ग नहीं बनाया गया है, बस 19 सालों से प्रकाशित सूची में थोड़ा बदलाव किया गया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने 2014 में बदली व्यवस्था के तहत ठेके पर खेती करने वालों को खेतिहर मज़दूर मान लिया है।

यानि खेती करने वाले किसानों के अलावा बाकी को चिन्हित करना और साबित करने का पेंच इसमें अड़ा दिया गया है ताकि किसान की आत्महत्या के आंकडे वर्गीकृत रुप में अलग दिखें।

राजस्थान के संदर्भ में 2017 में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने माना कि आठ सालों में दो हजार 870 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। 2008 से 2015 का आंकडा पेश करते हुए बताया गया कि साल 2008 में 796 किसान, 2009 में 851 किसान,साल 2010 में 390 किसान,2011 में 268 किसान, 2012 में 270 किसान, 2013 में 292 किसानों ने आत्महत्या की। 2014 में एक भी किसान आत्महत्या नहीं हुई और 2015 में किसान आत्महत्या के तीन मामले सामने आए।

खेती हर मजदूर किसान की आत्महत्या का आंकडा 73 है। दोनों को मिला दीजिए राजस्थान में 2015 में 76 किसानों ने आत्महत्या की है। लेकिन आंकडों का खेल देखिए कि सरकार किसानों की 3 आत्महत्या बताकर कर पल्ला झाड़ रही हैं।

अभी भी इसी वर्गीकरण के चलते सरकार के मंत्री मानने को तैयार ही नहीं होते कि राजस्थान में किसान आत्महत्या कर रहा है। जबकि हाड़ौती में लहसून की पैदावार और लागत मूल्य तक नहीं निकाल पाने से किसानों के आत्महत्याओं करने की जानकारियां आ रही हैं।

किसान जिस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों लागू करने की बात कर रहे हैं। उन सिफारिशों में साफ लिखा है कि फ़सल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों दिया जाना चाहिए। किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाए। गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए। महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं।

किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए,ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके। सरप्लस और इस्तेमाल नहीं हो रही ज़मीन के टुकड़ों का वितरण किया जाए। खेतीहर जमीन और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कॉरपोरेट को न दिया जाए। फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले। खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद तक पहुंचे। सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके चार फीसदी किया जाए। कर्ज की वसूली में राहत, प्राकृतिक आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज से राहत हालात सामान्य होने तक जारी रहे। लगातार प्राकृतिक आपदाओं की सूरत में किसान को मदद पहुंचाने के लिए एग्रिकल्चर रिस्क फंड का गठन किया जाए।


किसान इन्हीं सिफारिशों को लागू करने की मांग सालों से कर रहे हैं। इसके साथ ही देशव्यापी किसानों के पूरे कर्ज को माफ करना, किसानों को उनकी उपज का डेढ गुना लाभकारी मूल्य दिलाना जैसी मांगे हैं। इसके अलावा किसान आंदोलनकारी बेहद छो़टे किसान जो उत्पादन विक्रय करने मंडी तक नहीं पहुंच पाते, उनके परिवार के जीवनयापन के लिए उनकी आय सुनिश्चित करवाना चाहते हैं।

किसानों ने दूध,फल,सब्जी,आलू,प्याज,लहसुन,टमाटर में भी डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य की मांग रखी है। किसान आंदोलनकारी चाहते हैं कि सरकार सभी फसलों को खरीदने की गारंटी का कानून बनाए।


किसानों की जरुरत और मांगों कितनी वाजिब हैं...ये सरकार बेहतर जान सकती है। लेकिन ये तय है कि जनमानस की भावना है कि चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो ऐसी व्यवस्था करे कि जिन्हें अन्नदाता कहते हैं वो आत्महत्या को मजबूर न हो। किसानों के मुद्दे पर न बेवजह की राजनीति हो और न सरकारी जुमलेबाजी हो।

ये वो तबका है जिसे उसके हक से भी ज्यादा देना जरुरी है क्योंकि सूखी धरती का सख्त सीना चीर कर जो सृजन करने की साहस रखता है उस किसान का चेहरा कोई बेबस और मजबूर नहीं देखना चाहता।