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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – आंखों में धूल

सर्दी से बचाव का अधिकार सबका है। ठिठुराती सर्दी में खुले में रात गुजारने को मजबूर लोगों के लिए हर वर्ष सरकार रैन बसेरे खोलती है और इसके खूब ढोल भी पीटती है।

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Gulab Kothari

फोटो: पत्रिका

सर्दी से बचाव का अधिकार सबका है। ठिठुराती सर्दी में खुले में रात गुजारने को मजबूर लोगों के लिए हर वर्ष सरकार रैन बसेरे खोलती है और इसके खूब ढोल भी पीटती है। बेघर लोग रैन बसेरों में जगह तलाशने भी जाते हैं। लेकिन जब कोई राहत पाने के लिए इनमें शरण लेना चाहता है तो शर्त लगाई जाती है कि जिसके पास आधार है वही रैन बसेरे में रात्रि विश्राम कर सकता है।

सर्दी से बचने का अधिकार किसी भी पहचान पत्र से बड़ा होना चाहिए। फिर एक ही व्यक्ति, एक ही शहर और कानून अलग-अलग क्यों? यह तो नया प्रश्न उभरा है कि जिसके पास आधार कार्ड है वही सो सकता- रैन बसेरे में। शहर में तो रह सकता है-चोरियां कर सकता है, अपराध में लिप्त रह सकता है, रैन बसेरे में नहीं सो सकता। वाह ! क्या प्रशासन है- शहर में रहने की छूट-पेट भरने के लिए और आधार कार्ड की मांग फाइलों का पेट भरने के लिए।

बात सिर्फ यही नहीं है कि आधार कार्ड मांगा जा रहा है? सवाल यह है कि क्या सब जगह आधार कार्ड मांगा जा रहा है? पूरे जयपुर में ई-रिक्शा चालकों को ही देख लो। सबसे बड़ा ताण्डव ई-रिक्शा का है। कौन पूछ रहा है आधार कार्ड ई-रिक्शा चालकों से? ये कोई सौ-दो सौ नहीं बल्कि इनकी संख्या हजारों में हैं। क्या इन सभी के पास आधार कार्ड हैं? इनमें घुसपैठिए तो शामिल नहीं हैं? ई-रिक्शा की वजह से होने वाला ट्रैफिक जाम किसी को क्यों नहीं दिखता। पुलिस ने क्यों बांध रखी है पट्टी अपनी आंखों पर? राजधानी व दूसरे शहरों की कच्ची बस्तियों को ही लो। एक ओर पुलिस कहती है घर पर नौकर रखने से पहले पुलिस में सूचना दर्ज कराओ। वहीं यही पुलिस-शहर में अवैध रूप से कच्ची बस्तियां बनते देखती रहती है। मानो किसी ने उनकी आवाज छीन ली हो।

कौन नहीं जानता शहर में कितने घुसपैठिए स्थायी रूप से बस गए हैं। अपनी पहचान बदलकर लोगों के घरों में घुस गए हैं। चिंता इस बात की है कि हमारे ही कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए देश हित को गिरवी रख देना चाहते हैं। माटी के सपूत हैं ये भी। आज पश्चिम बंगाल की जो स्थिति बनी हुई है इस अवैध घुसपैठ से, वह चरम पर है। वही स्थिति बिहार में सामने आई -चुनाव में। लाखों लोग वोटर लिस्ट में घुस गए। बंगाल में तो करोड़ों निकलेंगे। यहां भी वही होने वाला है। क्या यह देश की सुरक्षा का प्रमाण है।

वैसे तो आज लोग त्रस्त हैं माफिया से हर क्षेत्र में। घुसपैठ की यह समस्या क्या माफिया अथवा तस्करी नहीं है? क्या इसमें सत्ता और पुलिस का पूर्ण सहयोग नहीं है? हालत यह है कि बिना आधार कार्ड कोई शहर में रह रहा है और उसका पूरा परिवार सुरिक्षत भी है। सरकार उसको भी उतना ही राशन-पानी दे रही है- जितना देश के नागरिक को देती है। शिविर में जगह नहीं देना तो मात्र जनता की आंखों में धूल झोंकना ही है। प्रशासन की देशभक्ति पर गर्व करना चाहिए?

बात सिर्फ बढ़ते अपराधों की ही नहीं, घुसपैठिए परोक्ष रूप से देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाते हैं। स्थानीय लोगों को रोजगार या फिर उचित मेहनताना नहीं मिलता तो उसके लिए भी ये लोग जिम्मेदार हैं जो कम पगार पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं।

जब अवैध रूप से लोगों की बसावट होगी तो आबादी का दबाव भी बढ़ना तय है। आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ाने की एक वजह बढ़ती घुसपैठ भी है। पार्क व दूसरे सार्वजनिक स्थल समाजकंटकों के शरणगाह भी इसीलिए बनते नजर आते हैं।
क्या पुलिस नहीं जानती कि मानव तस्करी के साथ स्थानीय माफिया को सहयोग कौन कर रहे हैं? इनमें अपराधी कौन-कौन है? लड़कियों को भगाने के लिए 'कमाई' कौन कर रहे हैं? क्या पुलिस केवल माफिया और देश के दुश्मनों को ही आश्रय देने वाली बन जाएगी?

हर जगह देख लो- जेडीए अतिक्रमण ध्वस्त करती है- मीडिया में छाई हुई है। क्या घुसपैठियों की अवैध बसावट की ओर रुख करती है कभी। हमारे जनहित विरोधी जनप्रतिनिधि भी दबाव डालते होंगे। कोर्ट के आदेश भी नकार दिए जाते हैं। शेष क्या रह गया? जनता के नौकर जनता को ही उजाड़ने में व्यस्त हैं। यही कलियुग है क्या? क्या इन्हीं को समेटने कल्की रूप में नए अवतार प्रकट होंगे? आज तो मानो पृथ्वी ही यमलोक का पूर्ण परिचय दे रही है। सृष्टि का कटु सत्य है कि रावण के वंशजों को भी सजा पानी ही होगी। जो अन्न पेट में जाएगा, वह तो अपना काम करेगा।

गरीबों को राहत देने के बजाए उनके दुःख दर्द बढ़ाने वाले हर फरमान के पीछे मनमानी और भ्रष्टाचार की बू आती है। बड़ा काम घुसपैठियों को रोकने का ही नहीं बल्कि जो घुस आए हैं उन्हें वापस उनके ठिकाने भेजने का भी होना चाहिए। जमीनी स्तर पर सख्त निगरानी व्यवस्था नहीं हुई तो आधार कार्ड की अनिवार्यता भी खोखली ही बन कर रहने वाली है।

जिस तेजी से भ्रष्टाचार बड़ा हो रहा है, धन बटोरा जा रहा है। लोकतंत्र की खरीद-फरोख्त बढ़ रही है- दुर्घटना, रोग, मौत के भी आंकड़े बढ़ रहे हैं। बढ़ते भी रहेंगे। पुलिस से न्याय की अपेक्षा है। प्रकृति पर न छोड़ा जाए तो देश स्वर्ग बन जाएगा।