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इतिहास के पन्नों से जानें जाती हुई राजशाही और आती हुई लोकशाही का अद्भुत और रोचक किस्सा…

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जयपुर

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Nidhi Mishra

Jul 16, 2018

Rajasthan first assembly election history in Hindi

Rajasthan first assembly election history in Hindi

जयपुर। राजस्थान की पहली विधान सभा के लिए 4 जनवरी से 24 जनवरी 1952 तक मतदान हुआ। इस विधान सभा की 160 सीटों के लिए कुल 616 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव के माध्यम से राजस्थान में वास्तविक लोकतंत्र जन्म ले रहा था तथा जनता द्वारा अपनी सरकार चुनी जानी थी, किंतु राजशाही अब भी पर्दे के पीछे से अपने मोहरे चल रही थी और राजनीति के रंगमंच से विदा होने को तैयार नहीं थी, जिसकी गूंज इन चुनावों में दूर तक सुनाई दी। इसका परिणाम यह हुआ कि राजस्थान के अनेक दिग्गज नेता चुनावी रण में धूल चाटते हुए दिखाई दिए। राजाओं, रानियों और जागीरदारों ने इस चुनाव में रामराज्य परिषद, हिन्दू महासभा और जनसंघ के बैनरों पर चुनाव लड़े।

बड़े-बड़े राजाओं ने आजमाया भाग्य
जाती हुई राजशाही और आती हुई लोकशाही के कदमों की आहट सुनकर बीकानेर के महाराजा सादुलसिंह के पुत्र करणीसिंह ने 1952 के आमचुनावों में बीकानेर लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और वे भी कांग्रेसी प्रत्याशी को हरा कर विजयी रहे। करौली रियासत के पूर्व नरेश बृजेंद्रपालसिंह भी 1952 के आम चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में करौली विधानसभा सीट से लड़े और विजयी रहे। भरतपुर महाराजा बृजेंद्रसिंह के भाई गिरिराजशरण सिंह उर्फ बच्चूसिंह ने 1952 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव जीता। बृजेन्द्रसिंह के दूसरे भाई मानसिंह ने कुम्हेर विधानसभा सीट के लिये 1952 में केएलपी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और विजयी रहे। शाहपुरा के राजाधिराज अमरसिंह 1952 में पहली विधान सभा के लिये शाहपुर - बनेड़ा सीट से निर्दलीय चुने गये।


आंधी में दिए की तरह टिके रहे पालीवाल
राजस्थान की लोकप्रिय सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल महुआ और मलारना चौड़ से खड़े हुए और दोनों स्थानों से विजयी रहे। इस कारण पालीवाल जैसे कमजोर किंतु निर्विवाद नेता की बन आयी और वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हो गए। - डॉ. मोहनलाल गुप्ता, जोधपुर

राज्यसभा में भी पहुंचे राजा
1952 में पहली बार राज्यसभा का गठन हुआ तथा इसमें राजस्थान की पूर्व रियासतों से दो राजा पहुंचे। पहले थे खेतड़ी के राजाधिराज सरदार सिंह तथा दूसरे थे डूंगरपुर रियासत के महारावल लक्ष्मणसिंह। ये दोनों 1952 में निर्दलीय सदस्य रहे।


दिग्गजों की हुई पराजय
प्रथम आम चुनाव राजस्थान के दिग्गज नेताओं को जबर्दस्त धक्का पहुंचाने वाले थे। वस्तुत: इन नेताओं के कद इतने बड़े हो गए थे कि ये एक-दूसरे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उनका परस्पर टकराव और मनमुटाव आमजन के सामने आ गया था। जनता इन दिग्गजों को सहन करने को तैयार नहीं थी। पूर्व मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने चुनाव ही नहीं लड़ा और जयनारायण व्यास दो स्थानों पर पराजित हुए। गोकुल भाई भट्ट लोकसभा के चुनावों में परास्त होकर हमेशा के लिए राजनीति से पलायन कर गये। वृहद राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक्यलाल वर्मा ने चित्तौडग़ढ़ लोकसभा क्षेत्र से पराजित होकर टोंक क्षेत्र के लोकसभा उपचुनावों में भाग्य आजमाया और वहां से चुने जाकर लोकसभा में पहुंच पाए। बीकानेर के कद्दावर नेता रघुवर दयाल गोयल भी इन चुनावों से दूर रहे।

पथिक जैसे सर्वमान्य नेता ने भी देखी हार
पहले आम चुनावों में विजयसिंह पथिक ने माण्डलगढ़ क्षेत्र के लिए कांग्रेस से टिकट मांगा, जिसमें पूरा बिजौलिया क्षेत्र आता था, किंतु कांग्रेस ने माणिक्यलाल वर्मा के पत्नी के भाई गणपतिलाल वर्मा को टिकट दे दिया। बिजोलियां के पूर्व जागीरदार राव केसरीसिंह रामराज्य परिषद के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, इसलिए पथिक ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा भरा। घर की फूट के कारण पथिक भी चुनाव हार गए और वर्मा भी। विजयसिंह पथिक जिन जागीरदारों के खिलाफ जीवन भर जिस जनता की तरफ से लड़ते रहे, उसी जनता ने पथिक की जगह जागीरदार को ही चुना लिया।

जागीरदार भी नहीं रहे पीछे
मण्डावा ठिकाने के ठाकुर देवीसिंह ने 1952 में पहली विधान सभा के लिये उदयपुरवाटी सीट पर रामराज्य परिषद के टिकट पर चुनाव जीता। मण्डावा के ठाकुर भीमसिंह भी पहली विधान सभा के लिए नवलगढ़ सीट पर रामराज्य परिषद के टिकट पर निर्वाचित हुए। सामोद ठिकाने के महारावल संग्रामसिंह ने 1952 में आमेर की सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीता। बदनौर ठिकाने के ठाकुर ने 1952 में आसींद से चुनाव जीता। बनेड़ा ठिकाने के अमरसिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे। बिजोलिया ठिकाने के राव केसरसिंह भी विधायक चुने गए।

दूर खड़े तमाशा देखते रहे कई राजा-रानी
जयपुर महाराजा सवाई मानसिंह 30 मार्च 1949 से राजस्थान के राजप्रमुख के पद पर कार्य कर रहे थे। इसलिए उन्होंने पहले आम चुनावों में हाथ नहीं आजमाया। उदयपुर के महाराणा भूपालसिंह वृहत राजस्थान के अस्तित्व में आने से पूर्व संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख तथा 30 मार्च 1949 से वृहत राजस्थान के महाराज प्रमुख के पद पर कार्य कर रहे थे। इसलिए वे भी इन चुनावों से दूर रहे। कोटा महारावल भीमसिंह 25 मार्च 1948 को संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख तथा 18 अप्रेल 1948 को वृहत राजस्थान के उप राजप्रमुख बने थे। वे भी इन चुनावों से दूर रहे। धौलपुर, झालावाड़, अलवर तथा जैसलमेर रियासतों के पूर्व राजा-रानी भी प्रथम आम चुनावों से से दूर खड़े रहकर तमाशा देखते रहे। आगे चलकर इन सभी रियासतों के राजा-रानियों ने विधानसभाओं और लोकसभाओं के चुनाव लड़े। उनमें से कुछ तो आज भी सत्ता के शिखर पर हैं।