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तपस्या है Usta Art: मोहम्मद हनीफ उस्ता

बीकानेर की उस्ता कला के माहिर कलाकार मोहम्मद हनीफ उस्ता का कहना है कि यह कला एक तपस्या की तरह है। जब कोई उस्ता कलाकार हवेली में काम शुरू करता है तो आखिरी स्टेज तक आते.आते उसके पोते का भी हाथ उसमें लग जाता है। राजस्थान फोरम की चतुरंग ऑनलाइन श्रंखला में वह अपने कलात्मक सफर की जानकारी दे रहे थे।

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Feb 12, 2022

तपस्या है उस्ता कला: मोहम्मद हनीफ उस्ता

तपस्या है उस्ता कला: मोहम्मद हनीफ उस्ता


राजस्थान फोरम की चतुरंग श्रृंखला के तहत हुआ कार्यक्रम
कला प्रेमियों से रूबरू हुए बीकानेर की उस्ता कला के माहिर कलाकार मोहम्मद हनीफ उस्ता

जयपुर।
बीकानेर की उस्ता कला के माहिर कलाकार मोहम्मद हनीफ उस्ता का कहना है कि यह कला एक तपस्या की तरह है। जब कोई उस्ता कलाकार हवेली में काम शुरू करता है तो आखिरी स्टेज तक आते.आते उसके पोते का भी हाथ उसमें लग जाता है। राजस्थान फोरम की चतुरंग ऑनलाइन श्रंखला में वह अपने कलात्मक सफर की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा कि बीकानेर की हवेलियों और महलों में इस कला के बहुत अच्छे नमूने हैं। सुनहरी मुनव्वर नकाशी, सुनहरी मुनव्वर मीना, झंगाली आदि कई तरह की कलाकारी इस कला में समाहित है। गुड़ के साथ हरा कशिश मिलाकर काम किया जाता है ।

अंग्रेजी शासक दीवाने थे इस कला के
उन्होंने बताया कि बीकानेर के राजा सुजान सिंह के समय यह कला फली फूली और ब्रिटिश इससे इतने प्रभावित हुए कि वह इस कला को ब्रिटेन तक ले जाना चाहते थे। इसके लिए ब्रितानी शासकों ने मुल्तानी मिट्टी की पोट्रेट बनवा कर उस पर सोने की नक्काशी करवाई और इस तरह वह पोट्रेट जहाज से ब्रिटेन पहुंचाए गए। इसके बाद यह काम ऊंट के चमड़े के कूपे पर भी किया गया।
प्रकृति की उपासना है उस्ता कला
उन्होंने कहा कि बीकानेर में पानी की हमेशा कमी रही है। इस कला के लोग इसकी कला कृतियों में लाल, हरा और नीले रंग का बहुतायत में इस्तेमाल करते हैं। ऐसा करके ये कलाकार इस कला के माध्यम से एक तरह से प्रकृति की उपासना करते हैं। इसमें लाल रंग बहादुरी, हरा रंग प्रकृति और नीला रंग बारिश का प्रतीक माना जाता है।

आजादी के बाद खत्म होने लगी फिर सत्तर के दशक में पनपने लगी
उन्होंने कहा कि आजादी से पहले यह काम फल फूल रहा था जबकि आजादी के बाद लगभग खत्म सा होने लगा। पर 1975 में उस्ता कैमल हाइड ट्रेनिंग की स्थापना हुई जिसके निदेशक स्वर्गीय पदमश्री हिसामुद्दीन उस्ता बने और उन्हीं के निर्देशन में मैंने इस कला की शिक्षा ग्रहण की । उसके बाद तो इस कला को बीकानेर से बाहर भी फैलाया जाने लगा कोलकाता, वनस्थली में इन्होंने कई वर्कशॉप किए गए। अजमेर की दरगाह के गुंबद में भी इन्होंने काम किया और दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया दरगाह के हॉल में भी इन्होंने अपनी कला के रंग बिखेरे। कार्यक्रम के दौरान उस्ता ने मुगल शैली की नूरजहां बेगम की पेंटिंग और ऊंट के चमड़े के कुपे की कलाकारी के नमूने दिखाए। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले राजस्थान फोरम की कार्यकारी सचिव अपरा कुच्छल ने मोहम्मद हनीफ उस्ता का अभिनंदन किया।