
महेश जोशी व बेटा रोहित। पत्रिका फाइल फोटो
JJM Scam Rajasthan: जयपुर। जल जीवन मिशन मामले की चार्जशीट में एसीबी ने रुपयों के लेन-देन की जो कड़ी उजागर की है, उसके तार सीधे तत्कालीन मंत्री महेश जोशी और बेटे रोहित जोशी तक पहुंच रहे है। चार्जशीट के मुताबिक, जिस दौर में महेश जोशी जलदाय विभाग के मंत्री थे, ठीक उसी दौरान उनके बेटे रोहित जोशी की एक निष्क्रिय और घाटे में चल रही फर्म के खाते में लाखों रुपए का संदिग्ध लेन-देन हुआ और वहीं से मोटी रकम सीधे मंत्री पिता के निजी खाते में पहुंची।
रोहित जोशी की फर्म 'मैसर्स सुमंगलम लैंडमार्क एलएलपी' 10 अक्टूबर 2021 से पार्टनरशिप एक्ट के तहत पंजीकृत है, जिसका पता खुद महेश जोशी के जयपुर में सेन कॉलोनी, रेलवे स्टेशन के पास वाले घर का है। रियल एस्टेट और रेटिंग कारोबार के नाम पर बनी फर्म में रोहित जोशी की हिस्सेदारी 80 फीसदी है, लेकिन एसीबी की जांच में आया कि फर्म लगातार घाटे में थी और उसमें कोई सक्रिय कारोबार नहीं चल रहा था।
जिस दौरान फर्म के खाते में रकम पहुंच रही थी, ठीक उसी दौरान जलदाय विभाग जून 2023 के अंत तक आरोपी ठेका कंपनियों को 107 करोड़ रुपए का भुगतान जारी कर रहा था। यह भुगतान जिन दो कंपनियों को हुआ, वे हैं मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी (प्रोपराइटर महेश मित्तल) और मैसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी (प्रोपराइटर पदमचंद जैन)।
सक्रिय कारोबार न होने के बावजूद 7 अप्रैल से 5 जुलाई 2023 के बीच इस फर्म के खाते में अलग-अलग संदिग्ध ट्रेडिंग कंपनियों के जरिए करीब 50 लाख रुपए जमा हुए। जांच में इनमें से किसी का भी फर्म से कोई वैध कारोबारी रिश्ता नहीं मिला। एसीबी ने चार्जशीट में इसे रिश्वत की रकम को वैध बनाने की सीधी कोशिश बताया है। एसीबी के मुताबिक, यह रकम जलदाय विभाग में ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के एवज में मिली रिश्वत थी। इससे पहले, 24 फरवरी 2023 को इसी फर्म के खाते से 30 लाख रुपए आरटीजीएस के जरिए सीधे पूर्व मंत्री महेश जोशी के निजी बैंक खाते में ट्रांसफर किए जा चुके थे। उधर, महेश जोशी की ओर से कोर्ट में जल जीवन मिशन से जुड़े मामले में ही यह कहा जा चुका है कि उनके बेटे की फर्म में 50 लाख रुपए लोन के आए, जो लौटा दिए गए।
इन दोनों फर्मों ने इरकॉन इंटरनेशनल के जाली 'वर्क कम्प्लीशन सर्टिफिकेट' और एलओए के दम पर 237 में से 104 टेंडर हासिल कर लिए थे। इन्हीं जाली दस्तावेजों के आधार पर दोनों कंपनियों को निविदाओं में 'योग्य' मान लिया। सर्टिफिकेट को असली साबित करने के लिए बोगस ईमेल आइडी तक बनाई। जिनका भुगतान खुद पदमचंद जैन ने किया और इन्हीं फर्जी आइडी से विभाग को खुद वेरिफिकेशन मेल भेजकर पूरे सिस्टम को गुमराह किया।
चार्जशीट भी सवालों के घेरे में है। मामले के जानकारों के मुताबिक, जब जांच एजेंसी मान रही है कि रोहित जोशी की फर्म में आया पैसा 'संदिग्ध' है। उसका किसी भी जमाकर्ता कंपनी से कोई वैध कारोबारी रिश्ता नहीं था और इसी फर्म से 30 लाख रुपए सीधे मंत्री पिता के निजी खाते में पहुंचे। इतना कुछ दर्ज होने के बाद भी चार्जशीट के जिस हिस्से में आरोपियों के नाम हैं, वहां रोहित जोशी का नाम नहीं है। जिस खाते से रिश्वत "वैध" बनाने की कोशिश हुई, उसका मालिक कठघरे से बाहर कैसे रह गया? क्या केवल "बेटे की फर्म" कह देना जांच की सीमा तय कर देता है या खुद जांच एजेंसी गहराई में जाने से से बची।
Updated on:
13 Jul 2026 06:51 am
Published on:
13 Jul 2026 06:51 am
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
