
राजस्थान का रण: उत्तर राजस्थान की 39 सीटों का सियासी विश्लेषण-2
अनंत मिश्रा
राजनीति का खेल भी अजीब है। टिकट एक और दावेदार अनेक। उत्तर राजस्थान के छह जिलों के चुनावी समर में नामांकन और नाम वापसी के दौर में खूब उठापटक हुई। कुल 39 सीटों में कहीं बगावती तेवरों ने तो कहीं भितरघात की आशंका ने राजनीतिक दलों के साथ प्रत्याशियों के ललाट पर शिकन डाल दी है। विरोधियों से मुकाबले की बजाय प्रत्याशियों को अपनों से पार पाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। कांग्रेस व भाजपा दोनों के ही सामने बगावत और भितरघात से निपटना बड़ी चुनौती है।
पहले बात सरहदी इलाके गंगानगर की। पिछले चुनाव में दोनों जिलों की 11 में से 9 सीटें हथियाने वाली भाजपा को इस बार अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए खासा जोर लगाना पड़ रहा है। टिकटों की अदला-बदली ने उसके कई नेताओं को उससे दूर कर दिया है। गंगानगर सीट पर 1993 में भाजपा के दिग्गज भैरोंसिंह शेखावत को हराने वाले राधेश्याम गंगानगर इस बार पार्टी का साथ छोड़कर निर्दलीय मैदान में डटे हैं। इसी सीट पर कांग्रेस के बागी राजकुमार गौड़ 'हाथ' को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। रायसिंहनगर में सोहन नायक, करणपुर में पृथ्वीपाल सिंह संधु, सादुलशहर में ओम विश्नोई और अनूपगढ़ में शिमला नायक भी कांग्रेस की चुनावी नैया को हिचकोले खिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हनुमानगढ़ में बगावत नहीं है, पर 'वंचितों' की 'कारसेवा' से अधिकृत प्रत्याशी सचेत जरूर हैं।
बीकानेर जिले में कांग्रेस के बागी गोपाल गहलोत बीकानेर पूर्व और पश्चिम तो भाजपा के किशनाराम नाई डूंगरगढ़ सीट पर पार्टी उम्मीदवारों के लिए सिरदर्द बने हैं। खाजूवाला सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी गोविंदराम मेघवाल को भी भाजपा से अधिक 'अपने' लोगों की अंदरूनी खिलाफत का सामना करना पड़ रहा है। शेखावाटी को राजनीति का गढ़ कहा जाता है। सीकर, चूरू और झुंझुनूं को मिलाकर बने शेखावाटी की 21 सीटों में पिछली बार भाजपा के खाते में 12 सीटें गई थीं तो कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के बड़े नेता महादेव सिंह खंडेला तो सीएस वैद तारानगर में बगावत का झंडा बुलंद किए हुए हैं। सुजानगढ़ में भाजपा के पूर्व विधायक रामेश्वर भाटी और कांग्रेस की संतोष मेघवाल अपने-अपने पार्टी प्रत्याशियों की राह में मुश्किल पैदा कर रही हैं। झुंझुनूं जिले की मंडावा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी रीटा चौधरी को विजेन्द्र ओला के समर्थकों से खतरा है, तो झुंझुनूं में ओला के सामने रीटा चौधरी के समर्थक कोई गुल खिला सकते हैं। तारानगर में भी भाजपा प्रत्याशी को भी भितरघात का सामना करना पड़ रहा है।
जातीय समीकरणों पर जोर
सभी प्रत्याशी जोड़-तोड़ की रणनीति और जातीय समीकरणों को साधने में जुटे हैं। जिले की राजनीति में जाट जाति का बोलबाला है तो कुछ सीटों पर अल्पसंख्यक भी हार-जीत में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। सादुलपुर सीट पर भाजपा-कांग्रेस की तरफ से मैदान में जाट प्रत्याशी है। जाट मतों का विभाजन बसपा प्रत्याशी के लिए मददगार साबित हो सकता है तो सीकर में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के अल्पसंख्यक प्रत्याशी की मजबूती कांग्रेस की परेशानी का सबब बन सकती है।
नोखा पर नजरें समूचे प्रदेश की
उत्तर राजस्थान की नोखा सीट चुनावी समर में पूरे प्रदेश में चर्चित हो रही है। प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी को चुनौती देने के लिए उनकी भांजी इंदु यहां रालोपा से प्रत्याशी हैं। डूडी की जीत का दारोमदार बीकानेर पूर्व से कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया लाल झंवर पर भी निर्भर करेगा। झंवर नोखा से एक बार विधायक रह चुके हैं, तो पिछले चुनाव में वे डूडी के मुकाबले दूसरे नंबर पर रहे थे। झंवर को पार्टी टिकट मिलने, फिर कटने और दोबारा मिलने के बाद बीकानेर में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में पिछले दिनों काफी उबाल आया था।
Updated on:
26 Nov 2018 01:42 am
Published on:
26 Nov 2018 07:30 am
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