12 जुलाई 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Rajasthan Panchayat Election: ‘OBC आंकड़े आने के एक सप्ताह में ले लेंगे फैसला’, मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बताया पंचायत चुनाव का ‘रोडमैप’

Rajasthan में निकाय और पंचायत चुनाव पर मंत्री झाबर सिंह खर्रा का बड़ा बयान। OBC राजनीतिक आरक्षण के ट्रिपल टेस्ट और सटीक आंकड़ों को लेकर कही यह बड़ी बात।
4 min read
Google source verification
Jhabar Singh Kharra Statement Rajasthan Panchayat Urban Body Elections Update

Jhabar Singh Kharra - File PIC

राजस्थान में पिछले काफी समय से लंबित चल रहे स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों को लेकर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इन चुनावों में हो रही देरी और अन्य प्रशासनिक मुद्दों को लेकर राजस्थान सरकार के मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया है। मंत्री खर्रा ने स्पष्ट किया है कि पिछड़ा वर्ग (OBC) को स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में उचित राजनीतिक आरक्षण देने के संबंध में राज्य सरकार पूरी तरह से गंभीर है, लेकिन इस प्रक्रिया में आ रही कानूनी और तकनीकी अड़चनों के कारण निर्वाचन आयोग अभी तक चुनावी कार्यक्रम जारी करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने दिशा-निर्देशों और कानूनी बाध्यताओं का हवाला देते हुए मंत्री ने बताया कि पिछड़ा वर्ग आयोग की तरफ से सटीक और सत्यापित डेटा मिलने में हो रही देरी के कारण ही इस पूरे मामले का स्थायी निदान अभी तक नहीं निकाला जा सका है।

1 सप्ताह के भीतर फाइल होगी क्लियर

प्रदेश के लाखों मतदाताओं और भावी जनप्रतिनिधियों को आश्वस्त करते हुए मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि सरकार इस मामले को और अधिक लटकाना नहीं चाहती है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग पूरी गंभीरता दिखाते हुए जितनी जल्दी हो सकेगा, ओबीसी आबादी के सभी सटीक और सत्यापित आंकड़े राज्य सरकार को सौंप देगा।

मंत्री ने भरोसा दिलाते हुए कहा कि जैसे ही यह डेटा सचिवालय को प्राप्त होगा, उसके तुरंत बाद सरकार पूरी मुस्तैदी से काम करते हुए मात्र 1 सप्ताह के भीतर उस पर अपना अंतिम नीतिगत निर्णय ले लेगी और बिना किसी देरी के संशोधित और स्वीकृत सीटों की पूरी सूची राज्य निर्वाचन आयोग को फॉरवर्ड कर दी जाएगी, ताकि चुनाव का रास्ता पूरी तरह साफ हो सके।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और 'ट्रिपल टेस्ट' का गणित

मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए बताया कि पिछड़ा वर्ग को स्थानीय चुनावों में राजनीतिक आरक्षण का लाभ देने के संबंध में देश की सर्वोच्च अदालत का एक स्पष्ट और कड़ा निर्णय मौजूद है। इस निर्णय के तहत किसी भी राज्य सरकार को सीधे तौर पर आरक्षण लागू करने की अनुमति नहीं है। इसके लिए एक विशेष 'ट्रिपल टेस्ट' की प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य होता है।

इस नियम के तहत सबसे पहले स्थानीय प्रशासन को अपने-अपने स्तर पर फील्ड में जाकर एक प्रारंभिक सर्वे पूरा करना होता है, जिसके माध्यम से पिछड़ा वर्ग की आबादी और उनके प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति का खाका तैयार किया जाता है।

मौके पर जाकर सत्यापन करना है जरूरी

प्रारंभिक प्रशासनिक सर्वे पूरा हो जाने के बाद इस प्रक्रिया का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। इसके तहत राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्यों और विशेषज्ञों की टीम को खुद मौके पर जाकर उस सर्वे का जमीनी सत्यापन करना होता है। आयोग को यह सुनिश्चित करना होता है कि स्थानीय प्रशासन द्वारा जुटाए गए आंकड़े पूरी तरह से पारदर्शी, सटीक और त्रुटिहीन हैं या नहीं।

मंत्री ने कहा कि इसी पूरी वैज्ञानिक और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर जब अंतिम आंकड़े तैयार होकर सरकार के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं, तभी राज्य सरकार ओबीसी के राजनीतिक आरक्षण के प्रतिशत और उसकी पात्रता के बारे में कोई भी अंतिम और वैधानिक निर्णय लेने की स्थिति में आ पाती है।

आंकड़ों में देरी के कारण राज्य निर्वाचन आयोग के हाथ भी बंधे

स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने प्रशासनिक देरी को स्वीकार करते हुए सीधे तौर पर स्पष्ट किया कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा अब तक सरकार को पिछड़ा वर्ग के बिल्कुल सटीक और प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं। यही मुख्य तकनीकी वजह है जिसके कारण राज्य सरकार इस आरक्षण के मुद्दे का पूरी तरह से विधिक निदान करने में असमर्थ रही है।

सरकार के स्तर पर ही आरक्षण की सीटों और वार्डों का वर्गीकरण तय नहीं हो पाया है, इसी वजह से स्वायत्त शासी संस्थाओं और पंचायतों के चुनाव करवाने वाली मुख्य संवैधानिक एजेंसी यानी राज्य निर्वाचन आयोग भी चुनाव की अधिसूचना जारी करने की दिशा में आगे कदम नहीं बढ़ा सका है।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में चुनाव का बेसब्री से इंतजार

गौरतलब है कि राजस्थान में कई नगर निगमों, नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो जाने के बावजूद वहां प्रशासक काम देख रहे हैं। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के न होने से आम जनता को अपने छोटे-मोटे विकास कार्यों और पट्टों से जुड़ी समस्याओं के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओबीसी आरक्षण का यह पेंच सुलझते ही राजस्थान में एक बहुत बड़ा चुनावी बिगुल बजेगा, जो आगामी दिनों में प्रदेश की पूरी जमीनी राजनीति की दिशा और दशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।

बड़ी खबरें

View All

जयपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग