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राजस्थान के इस शहर के भूगर्भ में समाया है इतिहास, खुदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष

प्राचीन शहर टोडारायसिंह में खुदाई के दौरान हर बार प्राचीन मूर्तियां व अन्य अवशेष जरूर मिलते हैं।

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जयपुर

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Amit Purohit

Feb 06, 2023

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टोडारायसिंह प्राचीन श्याम देवरा मंदिर

टोडारायसिंह (टोंक) /पत्रिका न्यूज नेटवर्क. मुगलकाल में आतताई शासकों का दंश झेल चुके एक हजार वर्ष पुराने टोडारायसिंह नगर की कोख में इतिहास समाहित है। यही वजह है कि प्राचीन शहर में खुदाई के दौरान हर बार प्राचीन मूर्तियां व अन्य अवशेष जरूर मिलते हैं। हाल ही प्राचीन गोपीनाथ मंदिर परिसर की खुदाई के दौरान गणेशजी की प्राचीन मूर्ति निकलने के अलावा भीतर कमरे रूपी तहखाने व जलाशय (बावड़ी) के अवशेष भी निकलने की संभावना जताई है। जो चर्चा में इतिहास व संस्कृति से जुड़ा एक रहस्य बन गया है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से टोडारायसिंह की राजस्थान ही नहीं बल्कि देश में अपनी विशेष पहचान रही है।

नागवंश से लेकर कई राजपूत वंशो के शासनकाल में बड़ी रियासतों की राजधानी बने टोडारायसिंह का ऐतिहासिक लम्बा सफर रहा है। इस दरिमयान 7 वीं सदी से 17 वीं सदी तक शहर की तक्षकपुर, लाडपुरा, गढ़ चोट्याळा, टोडे से टोडारायसिंह नाम से अलग-अलग पहचान बनाई है। इस सफर के बीच प्राचीन संस्कृति से रूबरू होने वाले टोडारायसिंह शहर को मुगलकाल में आतताइयों के आतंक (दंश) से भी गुजरना पड़ा है। तक्षकगिरी तलहटी में बसे टोडारायसिंह शहर में तात्कालीन शासकों ने एक हजार वर्ष पूर्व प्राचीन मंदिर, महल व बावडिय़ों का निर्माण करवाया था। जो कि प्राचीन गाथा को संजोए विशाल पत्थरों से निर्मित वास्तु, शिल्प के अद्वितीय नमूने थे।

इन्हीं इमारतों में प्राचीन संस्कृति से जुड़े गोपीनाथजी, कल्याणजी, राघवरायजी व श्याम देवरा मंदिर तथा बीसलदेव (बीसलपुर) मंदिर स्थित है। बुजुर्ग लोग बताते है कि प्राचीन मंदिरों के भीतर व चारदीवारी निर्माण में हिंदू देवी देवताओं की तात्कालीन निर्मित मूर्तियों को स्थापित किया गया। जिन्हें मुगलकाल में न केवल खण्डित किया बल्कि विशाल मंदिरों को तोप के गोले से ध्वस्त करने का भी प्रयास किया गया। इस विध्वंस की पीड़ा आज भी प्राचीन श्याम देवरा मंदिर व काला कोट (राघवरायजी) का मंदिर अपने बिखरे अवशेषों के साथ पीड़ा बयां कर रहे है। जहां मंदिर के चारों ओर खण्डित दर्जनों मूर्तियां व अवशेष है। बताया जाता है कई मूर्तियां मलबे में दफन हो गई या उन्हें बचाने की कवायद में दबा दी गई। ब्रिटिशकाल में भी उक्त स्थलों की अनदेखी की गई तथा ये प्राचीन इमारते बीते दशकों में भी समाजकंटकों की शिकार हुई। दो दशक पहले पुरातत्व विभाग के तहत संरक्षण को लेकर मंदिरों के समक्ष विभाग ने संरक्षित स्मारक का बोर्ड लगाकर इतिश्री कर दी।

मुगलों ने किया बर्बाद:
शहर के प्राचीन मंदिर मुगल आतताईयों का दंश झेल चुके हैं। हालांकि ये मंदिर प्राचीन सभ्यता संस्कृति व शुद्धता के परिचायक है। जहां प्रत्येक मंदिर के लिए जलाशय व कोठ्यार (कमरा) पुजारी के लिए अलग से निर्मित होता था। अनदेखी के बीच बीते दशको में उक्त स्थलों को मलबे व मंदिरों के अवशेषो से भर दिया गया।

-तुलसीदास शर्मा, वयोवृद्ध शिक्षाविद् टोडारायसिंह

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