राजनीति का पहला उसूल है.. जिसने की शरम, उसके फूटे करम.. चुनाव जीतते ही नेताओं के पीले जर्द गाल तुरंत गुलाबी हो जाते हैं.. जो नेता चुनाव जीतने से पहले पिचके हुए छुआरे होते हैं… वे कुर्सी पाते ही दूध में पड़े खजूर की जैसे फूल जाते हैं… किरकाट से पाटागोह बन जाते हैं.. और गोह का स्वभाव होता है कि एक बार पैर जमा लेती है तो फिर उस जगह को मरते दम तक नहीं छोड़ती.. ये नेता भी ऐसे ही कुर्सी से चिपक जाते हैं.. लेकिन बेचारी जनता.. दिल टूटे मजनूं की तरह कपड़े फाड़कर रोती-गाती घूमती है.. क्या हुआ तेरा वादा.. वो कसम वो इरादा.. कसम इरादे तो सब गए भाड़ में… नेता तो भंवरे की तरह सत्ता रानी से चिपके माल पीते रहते हैं.. यही आज की राजनीति का ***** सच है.. और इस सच को देखकर तो बस ये ही याद आता है…