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पढ़िए कविता ‘अथाह अनुभूति’

'बिंब' यह कविता का मूल आधार है बिना बिंब के कविता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। शब्दों से ही कविता की कल्पना को साकार किया जाता है।

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पढ़िए कविता 'अथाह अनुभूति'

पढ़िए कविता 'अथाह अनुभूति'

कविता मनोभावों और विचारों को शब्दों में प्रकट करती है। यह कलात्मक रूप से किसी भाषा द्वारा प्रकट होती है। इसलिए किसी ने सच ही कहा है जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि, मन की शक्ति की ताकत के आगे कुछ नहीं है। पढ़िए ऐसी ही यह कविता और महसूस करिए इन भावनाओं को

हजारों तंत्र हो मुझ में

हजारों मंत्र हो मुझ में

मैं फिर भी

लीन रहूं तुझ में।

न ज्ञान का

अहंकार हो मुझ में

न अज्ञान का

भंडार हो मुझ में

मैं फिर भी

लीन रहूं तुझ में।

योग का भंडार हो मुझ में

तत्व का महाज्ञान हो मुझ में

मैं फिर भी

लीन रहूं तुझ में।

न जीत का

एहसास हो मुझ में

न हार का हृास हो मुझ में

मैं फिर भी

लीन रहूं तुझ में।

न जीवन की

चाह हो मुझ में

न मृत्यु की राह हो मुझ में

मैं फिर भी लीन रहूं तुझ में।


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