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राइट टू हेल्थ बिल में बड़ा आरोप….यह बिल अ​धिकार देने वाला नहीं “मारने” वाला

चिकित्सा संगठनों से विचार विमर्श, सुझाव भेजे जाएंगे प्रवर समिति को

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जयपुर

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Vikas Jain

Jan 19, 2023

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जयपुर. राज्य के चिकित्सक व चिकित्सा कर्मी संगठनों ने राइट टू हेल्थ बिल के प्रावधानों में सुधार किए बिना इस बिल को मानने से साफ इनकार कर दिया है। बिल में सुधार के लिए मंगलवार को स्वास्थ्य भवन में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की चिकित्सकों व चिकित्सा संवर्ग के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों से वार्ता हुई। बैठक शुरू होते ही प्रतिनिधियों ने बिल की खामियां गिनाना शुरू किया तो वहां मौजूद कुछ अधिकारी खफा हो गए। इसके बाद हंगामा भी हुआ। गौरतलब है कि विधानसभा के पिछले सत्र में राइट टू हेल्थ बिल लाया गया था। लेकिन बिल के कुछ प्रावधानों पर एतराज जताते हुए निजी क्षेत्र ने सदन के बाहर इसका कड़ा विरोध किया। वहीं सदन के अंदर भी कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही कई विधायकों ने इसका विरोध किया था। इसके बाद सरकार ने यह बिल वापस लेकर प्रवर समिति के पास भेजने का निर्णय किया था।

बैठक के बाद संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि बिल में कई प्रावधान ऐसे हैं, जिनसे निजी चिकित्सा क्षेत्र को मारने की कोशिश की जा रही है। बैठक में चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख शासन सचिव टी. रविकांत, चिकित्सा सचिव डॉ. पृथ्वी सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे। जानकारी के मुताबिक चिकित्सक संगठनों ने 49 पन्नों के बिल का मसौदा सरकार को दिया है। इसे अब प्रवर समिति के पास भेजा जाएगा।

यह कहा संगठनों के प्रतिनिधियों ने

- हम चाहते है यह बिल पास हो, जनता को लाभ मिले, लेकिन स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ इलाज नहीं, लोगों को हर तरह से सेहत की गारंटी देना है

- यह राइट टू हेल्थ बिल नहीं, बल्कि राइट टू किल बिल है, जो प्राइवेट अस्पतालों पर थोपा जा रहा है
- इस बिल में इमरजेंसी इलाज और प्रसूता केयर को परिभाषित नहीं किया गया है

- राज्य व जिला स्तर पर प्राधिकरण से आएगा इंस्पेक्टर राज
- अदालत का अधिकार छीनना निजी अस्पतालों का अधिकार छीनने जैसा

- इस बिल से आए दिन अस्पतालों में विवाद बढ़ेंगे
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आईएमए के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. संजीव गुप्ता ने कहा कि बिल में आपराधिक प्रक्रिया संहिता के आधार पर जांच शुरू करने के लिए जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण और सरकार के चुने हुए सदस्यों को शक्तियां देना गलत है। इससे अस्पतालों को धमकी दी जा सकती है। आपातकालीन स्थिति की आड़ में मरीजों का मुफ्त इलाज नहीं किया गया तो इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अस्पतालों के लिए मुआवजे और प्रतिपूर्ति राशि की समय-सीमा परिभाषित नहीं है, जो असंवैधानिक है। प्रदेश कांग्रेस सामाजिक एवं न्याय अधिकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. संजीव गुप्ता ने आरोप लगाया कि सरकार की छवि खराब करने के लिए कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर बिल में ऐसे प्रावधान शामिल किए हैं, जिससे निजी चिकित्सक आक्रोशित हो। उन्होंने बिल में सुधार की मांग की।