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रियासतकाल में दशहरा कोठी पर होता था शाही समारोह, निकलता था शाही जुलूस, खेजड़ी वृख्क्ष की होती थी पूजा

दशहरे पर तोपों के साथ सेना की टुकडिय़ां करती थी परेड...

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जयपुर

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Dinesh Saini

Sep 30, 2017

Old Jaipur

जयपुर। दशहरे पर आमेर रोड की दशहरा कोठी पर आयोजित शाही समारोह में विद्वान और महाराजा मिलकर खेजड़ी के वृक्ष का पूजन करते।

इस दिन सिटी पैलेस से नीलकंठ पक्षी को पिंजरे से आजाद किया जाता। शहर के मोहल्लों में भी लोग खेजड़ी की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना करते थे। महाराजा का शाही जुलूस दशहरा कोठी पर खेजड़ी का पूजन करने जाता। जिसमें सिटी पैलेस के भगवान सीतारामजी मदिर का रथ आगे चलता। रथ, घोड़े, पालकी, तोपों के साथ सेना की टुकडिय़ां परेड करती हुई चलती। दशहरा कोठी पर पहले से मौजूद महंत और विद्वान गुरुओं के साथ महाराजा भी खेजड़ी के नीचे बैठते। वहां पर जया, विजया, अपराजिता आदि देवी देवताओं का शास्त्रोक्तव पुराणोक्त विधि से मंत्रोचारण होता। विष्णु परिक्रमा के बाद नवरात्र के नवांकुर जौ के जवारे बांटे जाते। जवारों को सुख-समृद्धि एवं एेश्वर्य प्रदान करने का द्योतक माना है। भगवान सीतारामजी की आरती के बाद समारोह का समापन होता। देवर्षि कलानाथ शास्त्री के मुताबिक शास्त्रों में खेजड़ी वृक्ष को खुशहाली का प्रतीक माना है। ईश्वर प्रदत विजयकाल के सर्व सिद्दि प्रदायक शुभ मुहूर्त में खेजड़ी का पूजन करना और नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।

शहर के लोग भी खेजड़ी की पूजा के बाद खेजड़ी की छाल को साथ लाते और यह कहते हुए घर आते कि आज हम ‘सोना’ लेकर आए हैं। खेजड़ी को राजस्थान का कल्पवृक्ष भी कहा गया है। शास्त्रों में खेजड़ी का नाम शमी वृक्ष भी है। पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने हथियारों को खेजड़ी के पवित्र वृक्ष के नीचे छिपाया था। सियाशरण लश्करी के पास मौजूद सन १९५५ के एक समाचार पत्र के सर्वेक्षण में मैसूर के दशहरे को देश में पहला स्थान और जयपुर के दशहरे को दूसरा स्थान मिला। ढूंढाड़ राजवंश खुद को अयोध्या के राजा राम की गद्दी का सेवक मानकर अयोध्या की परम्पराओं के तहत दशहरा आदि त्योहार मनाता है।

अयोध्या नरेश भगवान राम ने भी खेजड़ी पूजन क र नीलकंठ पक्षी को आजाद किया था। सुरेश सिंह तामडि़या ने बताया कि कछवाहों में मानसिंहोत राजावतों के ईसरदा, झिलाय, शिवाड़, तामडिय़ा और दहलाल आदि ठिकानों में भी नीलकंठ को आजाद कर खेजड़ी पूजन होता था।

सवाई जयसिंह ने दशहरा पूजन के लिए आमेर रोड पर विजय बाग बनवाकर उसमें खेजड़ी का पेड़ लगवाया था। विजय बाग में मीठे जल का कुआं होने के कारण इसे दशहरा कोठी कहने लगे। पुरानी राजधानी आमेर के उत्तरी पूर्वी कोने पर में खेजड़ी पूजन होता था।