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आरपीएमटी-2009 मुन्नाभाई फर्जीवाड़ा मामला, 17 साल बाद आरयूएचएस को “कुछ पता नहीं” 

जयपुर। राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से 17 वर्ष पहले आयोजित आरपीएमटी परीक्षा 2009 में उजागर हुए फर्जीवाड़े के मामले में 50 अभ्य​​र्थियों का रिकॉर्ड ही विवि के पास उपलब्ध नहीं है। विवि ने  यह स्वीकार किया है कि 66 अभ्यर्थियों के खिलाफ हुई कार्रवाई का संपूर्ण दस्तावेज रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। केवल […]

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जयपुर

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Vikas Jain

Mar 01, 2026

RUHS Hospital

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जयपुर। राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय की ओर से 17 वर्ष पहले आयोजित आरपीएमटी परीक्षा 2009 में उजागर हुए फर्जीवाड़े के मामले में 50 अभ्य​​र्थियों का रिकॉर्ड ही विवि के पास उपलब्ध नहीं है। विवि ने  यह स्वीकार किया है कि 66 अभ्यर्थियों के खिलाफ हुई कार्रवाई का संपूर्ण दस्तावेज रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। केवल 16 अभ्यर्थियों से संबंधित सूचना ही उपलब्ध कराई जा सकी है।

यह मामला तब सुर्खियों में आया था जब परीक्षा में प्रथम रैंक सहित कई स्तरों पर गड़बड़ी के आरोप सामने आए। मामला अदालत पहुंचा और राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश पर गठित पी.के. सिंह जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में 66 अभ्यर्थियों को विभिन्न स्तरों पर फर्जीवाड़े में शामिल माना था। रिपोर्ट में कुछ उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों की संलिप्तता के संकेत भी दर्ज बताए गए थे। हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट की सराहना करते हुए विवि को संपूर्ण रिपोर्ट पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था। लेकिन सूचना के अ​धिकार में मांगी गई जानकारी पर विवि की ओर से दिए गए जवाब में सामने आया कि विवि के पास पूरा रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि कोर्ट ने एक महीने में कार्रवाई का स्पष्ट निर्देश दिया था, लेकिन उसके बावजूद आज तक विवि के पास कार्रवाई का पूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

दूसरों की जगह थी परीक्षा

इस मामले में उस समय विवि ने 16 अभ्यर्थियों को निष्कासित करने का आदेश जारी किया था। ये वे अभ्यर्थी बताए गए जो दूसरे की जगह परीक्षा देने या दिलाने के मामले में सामने आए थे। हालांकि, बाद में इन अभ्यर्थियों ने डबल बेंच से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। जानकारी के अनुसार इनमें से कई आज विभिन्न सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।

बड़े सवाल

  • शेष 50 अभ्यर्थियों पर कभी कोई कार्रवाई हुई ही नहीं ?
  • यदि हुई, तो उसका रिकॉर्ड कहां गया ?
  • दस्तावेज नष्ट हुए या फाइलें दबा दी गईं ?
  • ‘रिकॉर्ड नहीं’ बनाम ‘हाईकोर्ट का आदेश’

सख्त कार्रवाई होती तो थमते भर्ती घोटाले

इस मामले को एसओजी को सौंपा जाना चाहिए। यदि 2009 में सख्ती से कार्रवाई होती और कमेटी की सिफारिशों पर अमल किया जाता, तो बाद के वर्षों में भर्ती परीक्षाओं में सामने आए फर्जीवाड़ों पर अंकुश लग सकता था। किसी भी भर्ती परीक्षा में पारदर्शिता और त्वरित दंड ही भविष्य के अपराधों को रोकते हैं। यदि दोषियों को वर्षों तक राहत मिलती रहे, तो सिस्टम की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
डॉ.राजेन्द्र कुमार शर्मा, आरटीई ए​क्टिविस्ट

विवि से नहीं मिले यह जवाब

-  शेष रिकॉर्ड क्यों उपलब्ध नहीं है

  • क्या उस समय की फाइलें सुरक्षित रखी गई थीं ?
  • क्या कोई आंतरिक ऑडिट हुआ ?
  • क्या राज्य सरकार को पूरी रिपोर्ट भेजी गई थी?

अब क्या हो?

पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से पुनर्समीक्षा
हाईकोर्ट के आदेश की पालना की स्थिति सार्वजनिक
संबंधित अभ्यर्थियों की वर्तमान पदस्थिति की जांच
परीक्षा प्रणाली में बायोमेट्रिक और डिजिटल सत्यापन की अनिवार्यता

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