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RTE Admission: निजी स्कूलों का टका सा जवाब… पहले फीस भरो, फिर प्रवेश की बात करो

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाने के लिए प्रवेश प्रक्रिया तो शुरू कर दी लेकिन इसका फायदा अभिभावकों को नहीं मिल रहा है।

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विजय शर्मा/जयपुर। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाने के लिए प्रवेश प्रक्रिया तो शुरू कर दी लेकिन इसका फायदा अभिभावकों को नहीं मिल रहा है। लॉटरी में चयनित होने के बावजूद नर्सरी के पात्र बच्चों को निजी स्कूल आरटीई के तहत प्रवेश नहीं दे रहे हैं। उन्हें फीस देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

स्कूलों का तर्क है कि सरकार ने पिछले सत्रों में पुनर्भरण राशि का भुगतान नहीं किया। विभाग ने हाल ही आरटीई के तहत लॉटरी निकाली है। अभिभावक चयनित बच्चों को स्कूलों में प्रवेश के लिए जा रहे हैं। लेकिन निजी स्कूल उन्हें लौटा रहे हैं। अभिभावकों से कहा जा रहा है कि पहले फीस दें फिर जब सरकार पैसा देगी तब वापस कर देंगे। अभिभावकों से एग्रीमेंट भी लिखवाया जा रहा है। अभिभावक इससे सहमत नहीं हो रहे हैं।

क्या है विवाद

शिक्षा विभाग ने 2023-24 में प्री-प्राइमरी कक्षाओं और प्रथम कक्षा में आरटीई के तहत प्रवेश लिए। लेकिन आरटीई का भुगतान सिर्फ प्रथम कक्षा में ही देने का फैसला लिया। इसका निजी स्कूलों ने विरोध किया।

शिक्षा विभाग के निर्देशों और कार्रवाई की चेतावनी के बीच निजी स्कूलों ने प्रवेश दे दिया। लेकिन स्कूल अब भुगतान की मांग कर रहे हैं। इसके बाद सत्र 2024-25 में फिर से शिक्षा विभाग ने नर्सरी में आरटीई के तहत प्रवेश प्रक्रिया शुरू की। इस बार भी प्री प्राइमरी कक्षा का भुगतान नहीं किया। अब निजी स्कूलों ने प्रवेश देने से इनकार कर दिया है।

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इन दो उदाहरण से समझें

केस 1: सोडाला के राकेश बंसल के बेटे का चयन एक बड़े स्कूल में नर्सरी कक्षा में हुआ है। लॉटरी में 7वां नंबर आया है। स्कूल में कहा कि आरटीई के तहत प्रवेश नहीं होगा। सरकार पैसा नहीं देती है तो फीस देनी होगी।

केस 2: सांगानेर निवासी वैभव गुप्ता की बेटी का चयन जगतपुरा के स्कूल में हुआ है। यहां भी नर्सरी कक्षा में प्रवेश से इनकार कर दिया। स्कूल प्रशासन ने कहा है कि आरटीई के पैसा आने के बाद ही प्रवेश होंगे।

दो साल से आरटीई के नाम पर छला जा रहा है। निजी स्कूलों पर कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। स्कूल प्रवेश से पहले अभिभावकों से एग्रीमेंट कर रहे हैं। यह शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन है।

दिनेश कांवट, अध्यक्ष पेरेंट्स वेलफेयर सोसायटी

कोर्ट में केस चल रहा है। हम केस जीत भी गए। हाइकोर्ट ने शिक्षा विभाग को नर्सरी का भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन इसके बाद भी स्कूलों को भुगतान नहीं किया जा रहा है।

हेमलता शर्मा, अध्यक्ष, स्कूल क्रान्ति संघ