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क्यों लगता है लेखक सत्यनारायण को कि आदमी सिर्फ एक जोड़ी जूता है!

अपनी यायावरी के लिए मशहूर लेखक सत्यनारायण के हालिया प्रकाशित रिपोर्ताज संग्रह ‘सब कुछ जीवन’ में पाठकों को मिलेंगे दिल को बेचैन कर देने वाले किस्से

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जयपुर

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Uma Mishra

Jul 04, 2019

रिपोर्ताज संग्रह ‘सब कुछ जीवन’ में पाठकों को मिलेंगे दिल को बेचैन कर देने वाले किस्से

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जयपुर. ‘ ये रिपोर्ताज या कथाचित्र जो भी कहें मेरे जीवन का वह कालखण्ड है, जो मेरे अगल-बगल नहीं, बल्कि बीच से गुजर रहा था और मैं डटा रहा, जीवन ही नहीं, साहित्य में भी। मेरे इर्द-गिर्द लोग जीवन की तपती लाय में अपने-अपने तरीके से लड़ जूझ रहे थे...।’ हाल ही प्रकाशित होकर आए अपने रिपोर्ताज संग्रह ‘सब कुछ जीवन’ की भूमिका में डॉ. सत्यनारायण जब ये लिख रहे होंगे, तब भी यकीनन उनका यायावर मन दूसरों के दुखों से बेचैन ही रहा होगा, न जाने कौनसी घटना उन्हें विचलित कर रही होगी, जिसे वे मानवीय दृष्टिकोण से किसी को सुनाना चाहते होंगे, ताकि इस छीजती संवेदनाओं के दौर में थोड़ी-सी भावुकता बची रह सके।

इस दौर में जहां कुछ ही घंटों में खबरें बासी होने लगती हैं, वहां दशकों पुरानी एक घटना को देशज शब्दों के सहारे जीवंत करने का काम सत्यनारायण ही कर सकते हैं। इस रिपोर्ताज संग्रह का पहला ही अध्याय एक ऐसी स्त्री के नाम है, जिस पर सत तो आ गया था, पर वो सती न हो पाई थी। यह उन दिनों की बात है, जब सत्यनारायण स्कूल में पढ़ते थे। एक रोज वे मां के साथ उस ओर चल दिए, जिस ओर से यह खबर आ रही थी कि एक स्त्री सती होने जा रही है।

प्रशासन ने उसे सती न होने दिया और समाज ने उसे दोबारा घर-परिवार न दिया, इन दो विपरीत फैसलों के बीच जो कुछ बचा, वो उसे मिला और साथ ही मिला एक कैदखाना, सत्यनारायण की मासूम आंखों का। देवीपुरा गांव की उस औरत का करुण चेहरा उन आंखों में कैद हो गया था। यूं तो कैदी छटपटाया करता है, पर यहां तो कैदखाना बेचैन रहा और एक रोज इस कैदी को मुक्त करने वहीं पहुंच गया, जहां उसे कैद किया था। एक उम्र गुजर चुकी थी इस बीच। ऐसे में मुक्ति कहां!

मन को भीतर तक नम कर देने वाली ऐसी न जाने कितनी ही घटनाएं हैं, पर हर घटना खबर नहीं बनती। सिर्फ पत्रकार का दोष कहां है? जिस्म से बहते हुए लहू से नजर हटे, तो आंख से टपका लहू नजर आए। हालांकि यह बात भी तो सत्यनारायण ही जानते हैं कि इस आंख से टपके लहू की अनदेखी होती रही, तो और भी जिस्म छलनी होते जाएंगे।

ऐसा नहीं कि उन्हें सिर्फ दुख ही दुख नजर आता है, उन्हें किसिम किसिम के फूल लिए मालने भी नजर आती हैं। उनमें से एक है केसर, जिसके लिए वे लिखते हैं- ‘इसी पांत में बैठी है केसर-सी ओढऩी ओढ़े केसर। खिरे हुए फूलों की बूढ़ी डाल-सी काया को समेटे। उसके मुंह में बैठी बुगलियों की पांत कभी की उड़ चुकी, अब बस फर-फर है। बीती जवानी की गंध की फर-फर।’
उनके इस खास लहजे ने ही तो उन्हें सबसे अलग पांत में रख दिया है। इसी पांत में उनके संग हो लेते हैं, कभी काफ्का तो कभी वो शख्स, जिसे देखकर, जिसे महसूसकर, उन्हें यह लगने लगता है कि आदमी सिर्फ एक जोड़ी जूता है।

इस संग्रह में जब चली आती है बूढ़ी बामणी, तो न जाने कहां से ये आवाज भी चली आती है- कि किसने कह दिया कि जमाना बदल गया है, वैसा ही तो है सब कुछ, आज भी औरतों को डायन बना दिया जाता है और वे चुपचाप सब स्वीकार कर लेती हैं, ताकि इस खोड़ली दुनिया में कम से कम जी तो सकें। ये जीना ही कितना मुहाल है, कितना मुहाल था इदरिस के लिए सौ रुपए जोड़ लेना और क्या कभी हो सकेगा यह कि धौलपुर के बाशिंदों के दिल में सुकून बस जाए! चंबल का पानी जहां जमीन को तर करता, वहीं उस जमीन पर बसने वाले लोगों को बेचैन भी करता है। इन बेचैनियों को एक बेचैन यायावर की नाप सकता है।

कलमकार मंच से आई यह किताब ‘सब कुछ जीवन’ पाठकों के मन में भीतर ही भीतर डूब रही संवेदनाओं को थोड़ी देर के लिए ही सही, पर तिर जाने का मौका तो देगी। चलते-चलते एक और बात लेखक के बारे में, कि वे सिर्फ कथेतर गद्य रचने में ही पारंगत नहीं हैं, उनकी कविताओं में वो कशिश है कि आप साठ पार हों या न हों, लेकिन उनकी कविताओं में ऐसे गिरफ्त होते हैं कि फिर उससे मुक्त होने की कोई कोशिश नहीं करते। साठ पार शृंखला की ये कविताएं जल्द ही एक किताब की शक्ल में साहित्य प्रेमियों के हाथामें होगी। इसी शृंखला से एक कविता-

यह शीर्षक


अब यही कि
मैं हूं बस जैसे कि तुम
जहां कहीं भी हो
क्या हम बेधडक़ भीड़ में
शामिल नहीं हो सकते
चाहें तो कफ्र्यू में बाहर
निकल सकते हैं
किसी दूधमुंहे के लिए दूध की खातिर
उस आदिवासी बाला के लिए
जो सिर पर लकडिय़ां ढोकर लायी
और पुलिस की गोली से मारी गयी
हम उन लकडिय़ों से मिले
रुपए लेकर
क्या उसके बच्चों तक नहीं पहुंचा सकते
मुझे लगता है
साठ के पार हमारे जीवन का
यह शीर्षक हो तो क्या बुरा है।