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सुरों की रानी ने कहा अलविदा… उमराव जान को कर गईं अमर, कहती थीं ‘जयपुर के श्रोता संगीत को समझकर सुनते हैं’

आशाजी ने रफी साहब के साथ मिलकर गायन में मुकाबला भी किया। यह शास्त्रीय संगीतज्ञ ही अच्छी तरह समझ सकते हैं कि सूरज फिल्म के इस गाने के मुखड़े 'कैसे समझाऊ बड़े ना समझ हो मैं समझाऊं में 'झा' पर सम पर आना इतना आसान नहीं था, पर उन्होंने इसको बड़ी सहजता से गाकर बता दिया था कि वह शास्त्रीय संगीत में भी अपना अच्छा दखल रखतीं थीं।

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Asha Bhosle

जयपुर में पत्रिका से जुड़े कार्यक्रम में राशिद खान के साथ प्रस्तुति देती आशाजी

Asha Bhosle Memories: जब सुना कि आशा भोसले (अवसा ताई) नहीं रहीं तो जेहन में आया कि अगर वह नहीं होतीं तो क्या आज की पीढ़ी पूर्व सदी की नामवर शायरा और नर्तकी उमराव जान' को जान पाती।

उमराव जान फिल्म में उन्हें बेशक संगीतकार खय्याम साहब ने अपने निर्देशन में खूब गवाया, पर यह आशा भोसले की आवाज थी कि 'दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए' गजल को उन्होंने इस अंदाज से गाया की लगा जैसे कि उमराव जान दोबारा जिंदा हो गई हो।

खुद मर कर उमराव जान को फिर से जान बख्शने वाली आशाजी की आवाज में जो खनक भी वो उनके गाए सैकड़ों गीतों में सुनी जा सकती है। बड़ी बहन लता की तरह वह ऐसी वर्सेटाइल सिंगर थी, जिन्होंने न केवल रोमांस से भरपूर गीतों को अपनी सुरीली आवाज में पिरोया, बल्कि उन्होंने 'मेरे रोम-रोम में बसने वाले राम… जैसे भजनों को भी भक्तिभाव से सजाया।

आशाजी ने रफी साहब के साथ मिलकर गायन में मुकाबला भी किया। यह शास्त्रीय संगीतज्ञ ही अच्छी तरह समझ सकते हैं कि सूरज फिल्म के इस गाने के मुखड़े 'कैसे समझाऊ बड़े ना समझ हो मैं समझाऊं में 'झा' पर सम पर आना इतना आसान नहीं था, पर उन्होंने इसको बड़ी सहजता से गाकर बता दिया था कि वह शास्त्रीय संगीत में भी अपना अच्छा दखल रखतीं थीं।

यही नहीं आशाजी ने गजल के शहंशाह मेहदी हसन को भी भारत में ही अपना गाना सुनाकर खूब दाद पाई थी। सिने जगत में आशा ताई गीत, गजल और भजन के अलावा फिल्म 'बरसा की रात' में ऐसी कालजयी कव्वाली ना ती कारवां की तलाश हैं,' में ये इश्क इश्क है' ऐसी तकरार करके गई है जो आने वाले कई वर्षों तक लोगों के जहन से नहीं जाएगी।

जयपुर में राशिद के साथ मिलाए सुर से सुर

जयपुर के श्रोताओं को लेकर आशा भोसले अक्सर कहती थीं कि यहां के लोग संगीत की समझकर सुनते हैं। यहीं वजह थी कि उनके कार्यक्रमों में कालाकार और दर्शकों के बीच एक अनोखा भावनात्मक रिश्ता बन जाता था।

इसी कड़ी में 2019 में कूकस स्थित एक सितारा होटल में आयोजित इंडियन म्यूजिक समिट से जुड़ा दिलचस्प किस्सा यह है कि एक संगीत संध्या में आशा भोसले ने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खां का गायन सुना। उस्ताद की गूंजती आवाज और राग की गहराई ने माहौल को इस कदर भाव-विभोर कर दिया कि आशा भोसले स्वयं भी इस प्रस्तुति में डूबती नजर आई और बीच-बीच में 'वाह' और 'क्या बात है' कहकर दाद देती रहीं। उन्होंने खान की गायकी को 'रूह को छू लेने वाला अनुभव' बताया।

भाषाओं का रियाज…

आशाजी ने मराठी तबके से ताल्लुक रखने की वजह से उर्दू पंजाबी और हिंदी जैसे भाषाओं का भी सुरों के साथ-साथ रियाज किया। आशाजी ने 'आओ हुजूर तुमको बहारों में ले चलूं पान खाए सैंया हमार, मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो कोई कांटा चुभ जाएगा' जैसे एकल गीतों से अपनी आवाज की खूबसूरती को तो पेश किया ही, साथ ही यह मोहम्मद रफी, मन्ना या किशोर कुमार आदि के साथ भी ऐसे-ऐसे गीत गा गई हैं कि वह अब भी कई सालों तक याद रखे जाएंगे।

संगीतज्ञ दीनानाथ मंगेशकर के संगीत परिवार की विलक्षण प्रतिभा की धनी आशा ताई लगभग 80 साल तक संगीत की सेवा करने के बाद भी कहती थीं कि युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह संगीत का रियाज तो करें पर यह भी देखें कि रियाज़ सही हो रहा है या नहीं।

आशा भोसले साहिर लुधियानवी लिखित गीत 'अभी ना जाओ छोड़कर, के दिल अभी भरा नहीं…।' यह सही भी है कि देश-विदेश के उनके प्रशंसक उन्हें और भी सुनना चाहते हैं क्योंकि, दिल अभी भरा नहीं। सुर की रानी को शतशत नमन…..

  • इकबाल खां, वरिष्ठ कला समीक्षक