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कोजागरी पूर्णिमा पर आज रातभर जागरण करने से दरिद्रता का नाश, आएगी सुख-समृद्धि

शरद पूर्णिमा का दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा को कई नामों से जाना जाता है, इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

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नूपुर शर्मा

जयपुर। शरद पूर्णिमा का दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा को कई नामों से जाना जाता है, इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। ब्रज क्षेत्र में महारास पूर्णिमा के रूप में इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महारास की झांकी के विशेष दर्शन होते है, श्रीकृष्ण गोपियों व राधाजी संग महारास करते हुए नजर आते है।

कोजागरी पूर्णिमा, रातभर जागकर करते है आराधना
आश्विन मास की पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है, इसलिए इसे जागृत पूर्णिमा भी कहते हैं। पूर्णिमा की रात को मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। इस रात जिस घर में देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है और माँ का जागरण होता है, उस घर को माता का आशीर्वाद मिलता है और देवी लक्ष्मी के प्रवेश से दरिद्रता का नाश होता है और सुख-समृद्धि आती है। कोजागरी का शाब्दिक अर्थ है कौन जाग रहा है?

महारास पूर्णिमा का महत्व
इस दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और किरणों के रूप में अमृत की वर्षा भी करता है। इस दिन खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने की विशेष परंपरा सालों से चली आई है। शरद पूर्णिमा पर मंदिरों में रास पूर्णिमा की झांकी के दर्शन होते है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इस दिन राधा रानी और अन्य गोपियों के साथ वृंदावन में रास रचाया था। भगवान कृष्ण भी चंद्रमा की तरह सोलह कलाओं से परिपूर्ण बताए गए है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में रास रचा रहे थे, तब चंद्रदेव आकाश से इस महारास को देख रहे थे और वे इतने भावुक हुए कि उन्होंने अपनी शीतलता से पृथ्वी पर अमृत बरसाना शुरू कर दिया।

समुद्र मंथन से प्रकट हुई देवी लक्ष्मी
शरद पूर्णिमा का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसलिए इस दिन देवी लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा का विधान है।

समुद्र मंथन से ही मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। देवराज इंद्र के कारण दुर्वासा ऋषि का अपमान हुआ था, जिसके कारण दुर्वासा ऋषि ने सभी देवताओं को श्राप दिया । उन्हें लक्ष्मी से रहित होने का श्राप मिला। सभी देवता भगवान विष्णु की स्तुति करते हैं, भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और सुझाव देते हैं कि देवी लक्ष्मी को पाने के लिए समुद्र मंथन किया जाना चाहिए। देवता और दैत्य समुद्र मंथन करने लगते हैं। जिसमें सबसे पहले समुद्र से जहर निकलने लगा। विष को फैलने से रोकने के लिए भगवान शिव ने विष पी लिया। इस वजह से उनका नाम नीलकंठ पड़ा। विष पीने के बाद, भगवान शिव ने फिर से मंथन को शुरू करा। मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुईं और सभी देवताओं का वैभव लौट आया।

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