
Shardiya Navratri जयपुर। चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है... जयपुर की आराध्यदेवी आमेर की शिला माता के दर पहुंच रहे हर भक्त ऐसे ही जयकारें लगा रहा है। आमेर महल के जलेब चौक में बनें मंदिर में शिला माता लोगों को दर्शन दे रही है। जो भी यहां आता है, उन्हें माता रानी के दिव्य दर्शन हो रहे है। जिन्होंने ने भी शिला माता को आराध्य देवी माना, हमेशा से उन पर माता का आशीर्वाद रहा है, अब दिन-प्रतिदिन माता की आस्था बढती ही जा रही हैं, नवरात्र में यहां आस्था का मेला लगता है....
आमेर किले में शिला माता का मंदिर है। 16वीं शताब्दी के इस मंदिर का आकर्षण अभी भी उसी तरह बरकरार है, कोई संकट आता है तो लोग माता रानी के दर्शनों के लिए चले आते हैं। जयपुर राजपरिवार के कछवाहा वंश की आराध्य देवी शिला माता आज जयपुरवासियों की भी आराध्य देवी के रूप में पूजी जा रही है।
बंगाल से आई शिला से तैयार हुई प्रतिमा...
कहा जाता है कि आमेर रियासत (जयपुर स्थापना से पहले) के प्रतापी शासक रहे मिर्जा राजा मानसिंह प्रथम पर इनकी असीम कृपा रही, मुगल शासक अकबर के प्रधान सेनापति रहते हुए मिर्जा राजा मानसिंह 16वीं शताब्दी में बंगाल से शिला लेकर आए, उससे माता की प्रतिमा बनवाई गई।
मूर्ति बनाने के बाद बची हुई शिला आज भी मंदिर में मौजूद...
जयपुर फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष रहे इतिहासकार सियाशरण लश्करी कहते हैं कि मिर्जा राजा मानसिंह प्रथम बंगाल से एक बड़ी शिला लेकर आए, इस शिला से ही माता की मूर्ति तैयार करवाई गई। मूर्ति बनने के बाद बची हुई शिला आज भी मंदिर के प्रथम भूतल में है, वहीं दूसरे भूतल में नीलम की मूर्ति विराजित है। वे बताते है कि माता के बलिदान की परंपरा कायम रही है।
पत्थर पर बने पत्ते बढ़ा रहे शोभा...
लश्करी कहते है कि शिला माता के मंदिर में मार्बल और दरवाजे पर पत्थर पर बने पत्तों का काम तत्कालीन राजा रहे मानसिंह द्वितीय की महारानी मरुधर कंवर ने करवाया है, जो आज भी मंदिर की शोभा बढ़ा रहे है। साल 1947 में मानसिंह द्वितीय के शासन के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती समारोह में मंदिर को 250 बीघा जमीन भी दी गई।
नवदुर्गा व दस महाविद्याएं भी मौजूद....
शिला माता मंदिर का मुख्य द्वार चांदी का बना हुआ है। इस पर नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री विराजित है, वहीं दस महाविद्याओं के रूप में काली, तारा, षोडशी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैंरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला भी विराजित है। दरवाजे के ऊपर लाल पत्थर की गणेशजी की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
महिषासुर मर्दिनी के रुप में प्रतिष्ठित...
शिला माता महिषासुर मर्दिनी के रुप में प्रतिष्ठित है। शिला देवी महिषासुर को एक पैर से दबाकर दाहिने हाथ के त्रिशूल मार रही है। इस मूर्ति के ऊपरी भाग में बाएं से दाएं तक अपने वाहनो पर आरुढ गणेश, ब्रह्मा, शिव, विष्णु व कार्तिकेय की मूर्तियां है। शिलादेवी की दाहिनी भुजाओं में खडग, चक्र, त्रिशूल, तीर और बाई भुजाओं में ढाल, अभयमुद्रा, मुण्ड, धनुष है। शिलादेवी के बाई ओर अष्टधातु की हिंगलाज माता प्रतिष्ठित है।
भोग लगने के बाद ही मंदिर के पट...
शिला माता को प्रतिदिन भोग लगने के बाद ही मंदिर के पट खुलते हैं। माता को भक्त विशेष रूप से तैयार गुजियों का भोग लगाते है। माता के प्रसाद स्वरूप नारियल भी चढ़ाया जाता है। माता रानी के तीन बार आरती और तीन बार ही भोग लगता हैं।
शिला माता के कब भोग व आरती
बालभोग - सुबह 8 बजे से 8.15 बजे तक
प्रात: आरती - सुबह 10 बजे
राजभोग - सुबह 11 से 11.30 बजे तक
संध्या आरती - शाम 6.30 बजे
रात्रि भोग - शाम 7.45 से रात 8 बजे तक
शयन आरती - रात 8.30 बजे तक
दो नवरात्र, माता के दर भक्तों की कतार...
चैत्र और आश्विन नवरात्र में माता के दर्शनों के लिए भक्तों की लम्बी कतारें लगती हैं। छठ के दिन मेला भरता है। नवरात्र में विशेष श्रृंगार किया जाता है। दो साल बाद इस बार फिर माता के मंदिर में छठ का मेला भरेगा, भक्त माता के दर्शनों के लिए उमड़ेंगे।
नवरात्र में शिला माता के दर्शनों का समय
सुबह - प्रात: 6 बजे से दोपहर 12.30 बजे
शाम - शाम 4 बजे से रात 8.30 बजे तक
पट मंगल - दोपहर 12.30 बजे से शाम 4 बजे तक
छठ का मेला भरेगा
मंदिर पुजारी बनवारी लाल शास्त्री ने बताया कि मंदिर में एक अक्टूबर को छठ का मेला भरेगा। वहीं सप्तमी पर 2 अक्टूबर को निशा पूजन होगा। 3 अक्टूबर को अष्टमी पर पूर्णाहुति होगी, वहीं दशमी पर 5 अक्टूबर को नवरात्रा उत्थापना होगा। भक्त माता को प्रसन्न करने के लिए यहां चुनरी और सौलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करते है।बहरहाल, समय के साथ-साथ शिला माता के दर पर आस्था का रैला भी बढता जा रहा है। माथे पर लाल चुनरी बांधे भक्त माता के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं।
Published on:
26 Sept 2022 07:28 pm

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