
She News- सभी को समान अधिकार और न्याय दिलवाने का प्रयास
बेटियों का रोका ड्रॉपआउट
राजस्थान की राजधानी जयपुर में उन बस्तियों में काम कर रही हैं मनीषा सिंह, जहां के विकास पर कोई ध्यान नहीं देता। 2012 से समाजसेवा से जुड़ी मनीषा कहती हैं कि जब मैं स्लम एरिया में जाकर वहां के लोगों से मिली तो पता चला कि वहां स्कूल तो हैं लेकिन न तो बाउंड्री वॉल है न ही शौचालय। इससे बच्चों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बच्चियां स्कूल से ड्रॉपआउट हो रही हैं और जो पढ़ रही थीं उन्हें माहवारी के समय अपने घर जाना पड़ता था। ऐसे में हमने जनसहयोग से स्कूलों में शौचालय बनवाए, जिससे बालिकाओं का ड्रॉपआउट कम होने लगा। एक समय इन स्कूलों में 56 बच्चे थे वहीं अब 300 से अधिक बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। जवाहर नगर कच्ची बस्ती और जगतपुरा के स्कूलों में वेंडिंग मशीन की सुविधा शुरू की, जिससे बच्चियों को सेनेटरी नेपकिन की सुविधा मिल सके। साथ ही हम स्कूलों में पर्सनेलिटी ग्रूमिंग पर भी काम कर रहे हैं। मनीषा के मुताबिक वह महिलाओं को रोजगार से जोडऩे के लिए भी काम कर रही हैं। जो महिलाएं छोटे-छोटे स्टार्टअप चलाती हैं उन्हें प्लेटफॉर्म दिया जाता है। साथ ही युवाओं को कला संस्कृति से जुड़ी जानकारी देने के लिए भी कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
92 बच्चियों को लिया गोद
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की महफूजा हुसैन पिछले 10 साल से स्वास्थ्य, शिक्षा, महिलाओं और बच्चों के लिए काम कर रही हैं। वह अब तक 30 से अधिक कैंसर पीडि़तों का फ्री में इलाज करवा चुकी हैं। वे कहती हैं कि जगदलपुर नक्सल प्रभावित इलाका है, लेकिन बेहद खूबसूरत है। जब भी मैं यहां आती और लोगों से मिलती तो पता चलता था कि सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा। लोग बीमार पड़ते तो झाड़ फूंक कर अपना इलाज करवाते थे। अस्पताल जाने में उन्हें डर लगता था। तभी से उन लोगों की मदद करना मैंने अपना कर्तव्य बना लिया। बेटियों को उनकी शिक्षा का हक दिलवाने के लिए मैंने 92 बच्चियों को गोद लिया है जिन्हें जगदलपुर ब्लॉक की विभिन्न शाखाओं में पढ़ाने के लिए भेजा जाता है। इसके अलावा 30 से ज्यादा कैंसर पीडि़तों का इलाज करा चुकी हूं। सरकार की तरफ से अभी तक किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिली। अब मेरा सपना बुजुर्गों के लिए एक संस्था का निर्माण करना है, जिससे मैं उनको सहारा दे सकूं।
लैंगिक समानता पर कर रहीं काम
गर्मियों की छुट्टियों में जब मैं अपने गांव जाया करती थी, तो देखती थी वहां की लड़कियां और महिलाएं घर में रहकर ही अपनी जिंदगी गुजार रही थीं। लडक़ा पैदा होता तो परिवार में मंगलगीत गाए जाते लेकिन बेटी के समय स्थिति अलग होती। मैंने सोच लिया था कि इस भेदभाव को समाप्त करना है, यह कहना है भोपाल की कुमुद ङ्क्षसह का। वे कहती हंै कि हम बातें तो सामाजिक न्याय की करते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। कॉलेज टाइम से ही लैंगिक समानता पर काम करने लगी थी। जब भी मेरे सामने हिंसा, बाल विवाह और महिला सुरक्षा और शिक्षा का कोई केस आता तो उनको समझाने की कोशिश करती जिसमें से कुछ मानते कुछ नहीं। साल 2006 में सरोकार संस्था से जुड़ी। संस्था के साथ मिलकर वर्कशॉप, नुक्कड़ नाटक, गाने या ग्रुप बनाकर लोगों को समझाते हैं कि बेटियों को भी समान अधिकार दो, जितनी खुशी लडक़ा होने पर होती है उतनी लडक़ी होने पर भी हो। मेरे पिता खुद सोशल एक्टिविस्ट थे, इस काम के लिए मैं उनसे ही इंस्पायर हुई थी। कई परेशानियां भी आईं लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। अब मैं इस काम को पूरे देश में करना चाहती हूं।
Published on:
22 Feb 2024 02:47 pm
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