जयपुर

लघुकथा-तोहफा-सविता मिश्रा

नीचे नोट में लिखा था- 'बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।' पढ़कर रामसिंह और सरोजा के आंखें डबडबा गई।

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Jul 12, 2018
लघुकथा-तोहफा-सविता मिश्रा

डोरबेल बजी जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाए 'इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ देती है।' दरवाजा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफाफा पकड़ा गया।
लिफाफे पर बड़े अक्षरों में लिखा था वृद्धाश्रम। रुंधे गले से आवाज दी- 'सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाडले ने क्या हसीन तोहफा भेजा है!'

रसोई से आंचल से हाथ पोछती हुई दौड़ी आई - 'ऐसा क्या भेजा मेरे बच्चे ने जो तुम्हारी आवाज भर्रा रही है। दादी बनने की खबर है क्या?'
'नहीं, अनाथ!'
'क्या बकबक करते हो, ले आओ मुझे दो। तुम कभी उससे खुश रहे क्या!'
"वृद्ध शब्द पढ़ते ही कटी हुई डाल की तरह पास पड़ी मूविंग चेयर पर गिर पड़ी।
'कैसे तकलीफों को सहकर पाला-पोसा, महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाया। खुद का जीवन इस एक कमरे में बिता दिया।' कहकर रोने लगी

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दोनों के बीते जीवन के घाव उभर आए और बेटे ने इतना बड़ा लिफाफा भेजकर उन रिसते घावों पर अपने हाथों से जैसे नमक रगड़ दिया हो।
दरवाजे की घंटी फिर बजी। खोलकर देखा तो पड़ोसी थे।
'क्या हुआ भाभी जी? फोन नहीं उठा रहीं हैं। आपके बेटे का फोन था। कह रहा था अंकल जाकर देखिए जरा। उसे चिंता करने की जरूरत है! चेहरे की झाुर्रियां गहरी हो गई।'
'अरे इतना घबराया था वह, और आप इस तरह। आंखें भी सूजी हुई हैं। क्या हुआ?'
'क्या बोलू श्याम, देखो बेटे ने..' मेज पर पड़ा लिफाफा और पत्र की ओर इशारा कर दिया।'
श्याम पोस्टकार्ड बोलकर पढऩे लगा। लिफाफे में पता और टिकट दोनों भेज रहा हूं। जल्दी आ जाइये। हमने उस घर का सौदा कर दिया है।
सुनकर झर-झर आंसू बहें जा रहें थे। पढ़ते हुए श्याम की भी आंखें नम हो गई। बुदबुदाये 'नालायक तो नहीं था बब्बू!'

रामसिंह के कंधे पर हाथ रख दिलासा देते हुए बोले- 'तेरे दोस्त का घर भी तेरा ही है। हम दोनों अकेले बोर हो जाते हैं। साथ मिल जाएगा हम दोनों को भी।'
कहते-कहते लिफाफा उठाकर खोल लिया। खोलते ही देखा - रिहाइशी एरिया में खूबसूरत विला का चित्र था, कई तस्वीरों में एक फोटो को देख रुक गए। दरवाजे पर नेमप्लेट थी सिंहसरोजा विला। हां! हां जोर से हंस पड़े।
'श्याम तू मेरी बेबसी पर हंस रहा है!' 'हंसते हुए श्याम बोले- 'नहीं यारा, तेरे बेटे के मजाक पर। शुरू से शरारती है वह।'
'मजाक..!'

'देख जवानी में भी उसकी शरारत नहीं गई।' कहते हुए दरवाजे वाला चित्र रामसिंह के हाथ में दे दिया।
नीचे नोट में लिखा था- 'बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।' पढ़कर रामसिंह और सरोजा के आंखें डबडबा गई।

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Published on:
12 Jul 2018 05:02 pm
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