
कहानी- रुजगार- चेतन स्वामी
खासा ऊंचा शरीर, लंबी टांगें, नीले चार-खाने की मैली-चीकट और छिद्रोंवाली लूंगी पहने इस आदमी को मैं रोज ही देखता हूं। उसका सफेद कुरता मैल से इतना गूगला हो रखा है कि इसे सफेद मानने को जी नहीं करता। उसी कुरते की एक लटकती बांह में से निकले हाथ को वह प्रत्येक यात्री के सामने पसारता है। उभरी नाडिय़ों वाला वह हाथ मेरी चितार में वैसे ही कैद हो गया है जैसे बस स्टैंड पर डालियां छितराए मुस्तैद खड़ा नीम का पेड़। यह आदमी भी रोज के चिर-परिचित दृश्यों में से एक हो गया है—मेरे लिए। वह एक हाथ से कंधे पर सोए अपने डेढ़ेक साल के बच्चे को संभाले हुए है और दूसरे हाथ से बच्चे की ओर इशारा कर रोजाना की कातर वाणी में कहता, 'देवो बाबू साहब, कोई रुपिया-धेली दो, इस बेचारे की मां मर गई है, इसे दूध पिलाऊंगा।' पूरी बस में हाथ पसारे-पसारे वह दो-तीन दफा एक ही जैसी गुहार लगता है। वह अपनी गुहार को कारुणिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। वाणी को थरथराने की चेष्टा करता है ताकि शब्द बच्चे के प्रति सम्वेदना से लिथड़ जाएं।
बस का कोई-सा ही यात्री उसकी शाब्दिक करुणा में भीगता है, बाकी तो उस मैले-कुचेले आदमी को देखकर अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लेते हैं। मैल से भरा वह घिन्न पैदा करता है। अधिकांश यात्रियों के मन में यह चलता है कि जितना शीघ्र हो, यह बस से उतर जाए, पर उनके मनों से उसका क्या? वह अपने पसरे हाथ को बस की अंतिम सीट तक ले जाता है। बावन सीट की बस में बावन ही प्रकार के लोग होते हैं—उदार, खिजे हुए, लूखे, मसखरे, मनमौजी, घुन्ने, असंग। ये तो बहुत थोड़े से प्रकार हैं। गौर करने पर आश्चर्य होता है—अरे! कितनी तरह के लोग होते हैं? अगर सभी लोग एक जैसे हो जाएं तो यह संसार तो बिलांत-भर भी आगे नहीं चल सकता। कई लोग उसे रुपया-दो रुपया कुछ-न-कुछ दे ही देते हैं।
बस रवाना होने ही वाली थी कि भागते से मिश्राजी बस के दरवाजे में घुसते आवाज देने लगे, 'बाबूजी, सीट रखी है न, लेट हो गया।' मैंने दूर से ही कहा, 'हां है' तो वे आश्वस्त हुए। सीट नहीं होने पर एक घंटे तक खड़े यात्रा करनी पड़ती है। बस रवाना होने को हुई तो वह मैला-कुचेला आदमी लोगों से अड़ते-भिड़ते उतरने की चेष्टा में जुट गया। मिश्राजी मेरी ओर बढ़ते, नाक सिकोड़ते उसे कह रहे थे, 'यार, नीचे से ही मांग लिया कर, इस भीड़ में क्यों चढ़ता है, इस बेचारे बच्चे को और रोसता है।' ऐसे बड़बड़ाते मिश्राजी मेरे तक पहुंच गए। उनकी जगह पर मैंने अपना बैग रख रखा था। बैग को जाली पर रख उन्होंने एक गहरी-सी सांस ली। मेरे पास बैठते ही उनमें से गुलाब की-सी भीनी महक छूटी। शायद वे एक ही किस्म की मीठी सुगंध का कोई डियो लगाते हैं। कोर्ट में काम करते हैं—मिश्राजी। मैं बैंक में कैशियर हूं। तनख्वाह मिश्राजी को मेरे से कम मिलती है, पर नफासत और शौकीनी मेरे से अधिक। कपड़ों से लेकर जूते तक हरेक चीज वे ब्रांडेड काम में लेते हैं। और मैं तो बस जो हाथ में आ जाए।
ठीकसर बैठते ही मिश्राजी ने माणकचंद का पाउच निकाला और हथेली के मध्य एक पूरी डोज तैयार कर फाकने से पहले रोज की भांति मुझासे कहा, 'थोड़ा-सा ले लो, दो दाने, मुंह फ्रेश हो जाएगा?' मैंने रोजाना का जवाब दिया, 'बस, धन्यवाद।' गुटके को तजबीज से गलाफ के हवाले कर उन्होंने हथेली को बस से बाहर झाड़काया, उस खंख की कुछ सौरम मेरे नथुनों तक भी पहुंची। शहर की सड़क के गड्डे पार कर बस अब हाइवे पर पहुंच गई। इस बस में कई सवारियां हैं जो सीकर नौकरी करने जाती हैं। घंटे-भर का रास्ता है, बातचीत से कट जाता है।
मैंने मिश्राजी से कहा, 'यार मिश्राजी, समय कितनी जल्दी बीत जाता है, मुझो नौ बरस हो गए अपडाउन करते, कुछ भी नहीं बदला, सिवाय हाथ में मोबाइल के।'
मिश्राजी मुस्कराए। मुंह निकाल सके, उतनी-सी खिड़की खोली और इतनी देर में इक_ा पीक को बाहर थूकते बोले, 'नौ साल में बहुत चीजें बदल गईं, पांच बच्चे बदल गए।'
'पांच बच्चे बदल गए? कौन से पांच बच्चे?'
मेरी हैरानी को उन्होंने अधिक देर टिकने नहीं दिया, 'अरे, यह लूंगी-कुरता पहने भिखारी आता है न बस में, इसके कंधे पर पांच बच्चे बदल गए। इसने भीख मांगने का एक तरीका तय कर रखा है, कंधे पर नींद लेता एक डेढ़ेक वर्ष का बच्चा होता है और यह उसकी मां मरने का कह कर भीख मांगता है, कई भावुक हृदय लोग तो इसे दस रुपया तक दे देते हैं, स्त्री जाति तो रुपया-दो रुपया देती ही है, बेचारे नन्हें बच्चे की मां मर गई।'
'यार मिश्राजी, देखता तो मैं भी इसे रोज हूं, इसके कंधे पर हमेशा नींद लेता एक बच्चा होता है, पर इस बात पर कभी गौर नहीं किया कि यह बच्चा वही है कि बदल गया।'
'ठीक ऐसे ही वक्त भी वही का वही लगते-लगते बदल जाता है।' मिश्राजी ने किसी तत्त्वज्ञ की भांति उक्ति की।
मैं क्षणभर सोचने लगा। दृश्य की कितनी चीजें हमें दिखती तो हैं, पर हमारे मतलब की न होने से हमारी दृष्टि वहां टिकती नहीं। नौ बरसों से रोज ही इस भिखारी को देखा है, पर इसे जानने की चेष्टा क्यों करता। जिस गांव जाना ही नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना! पर, अब मिश्राजी ने इसके प्रति मेरे भीतर एक जिज्ञासा जगा दी। शायद मिश्राजी इसके बारे में खासा जानकारी रखते हैं, तभी पांच बच्चों की बात कही। मैंने पूछा, 'आपको क्या पता इसके पांच बच्चे हो गए?'
भेद-भरी मुस्कराहट के साथ मिश्राजी ने प्रत्युत्तर दिया, 'तभी तो पांच बताए, छह नहीं, पता है भई।'
आगे मैं पूछता—यह कौन है, कहां रहता है, और कौन-कौन रहते हैं इसके साथ? पर मुझो ऐसे सवालों को पूछने की दरकार नहीं पड़ी। मिश्राजी स्वयं ही बताते चले—'यह साटिया है। बुधगिरि मढ़ी के पीछे रेलवे लाइन के पास पंद्रह वर्षों से इनके डेरे हैं। घुमक्कड़ जाति है, पर पिछले वर्षों से एक ही जगह टिकी हुई है। बढ़ती रुपए की भूख ने इन्हें भी धंधा बदलने को मजबूर कर दिया, कुछ ने मांगने से भी कोई गुरेज नहीं किया। सब-कुछ बदल गया, पर उनकी एक जूनी रीत अभी भी बदल नहीं पाई।'
'कौन-सी रीत?' मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मिश्राजी ने एक नामालूम भिखारी के संबंध में कितनी जानकारी जुटा डाली। एक बार फिर गुटके की पीक खिड़की से बाहर थूक उन्होंने पानी की बोतल से एक घूंट भरा और ठुड्डी पर ठहरी बूंद को पोंछते हुए कहने लगे, 'इस साटिए का नाम 'जस्सा' है और यह अपनी पत्नी का सौदा करना चाहता है। सौदा ही है वह प्राचीन रीत जो बदली नहीं। सौदे की शर्तें पूरी हो तो इससे कोई नट नहीं सकता। इसने पिछले दिनों अपने से दस वर्ष छोटी एक स्त्री से सौदा कर लिया, दो लाख रुपए और अपनी पत्नी को उसके पति को देना तय किया। स्त्री के सौदे में बच्चे बाप के पास ही रहेंगे, ऐसा तय हुआ। यह समय पर वह रकम दे नहीं पाया, तो उस स्त्री के पति ने सौदा करने से मना कर दिया। इसके पेशगी दिए एक लाख रुपए भी उसने नहीं दिए। अपनी पत्नी को वह ले गया और इसकी पत्नी को इसके पास छोड़ गया। उस साटिए की जोरावरी से दुखी होकर यह एक दिन कोर्ट में घूम रहा था। मुझो यह रोजाना बस में चढ़ते देखता है। मुझो देखकर यह रोने-रोने को हो गया और अपनी पूरी रामकहानी सुना डाली। कहा—भाई साहब, मुझो कोई अच्छा-सा वकील बताओ, मेरा सौदा मैं किसी भांति छोडऩा नहीं चाहता। साटिया होकर सौदा नहीं करूंगा तो मरने पर नरक मिलेगा। मेरे समाज में सौदा हारने पर बड़ी खामी मानी जाती है।
मैंने कहा—सौदे में तय रकम तुम्हारे से जुटी नहीं, उसमें उसका क्या दोष? उसने गिरगिराहट से कहा—बाबू, रुपए बिना कौन सौदा करता है, रुपए एक लाख मेरे पास थे, एक लाख मैंने आप जैसे किसी व्यक्ति को दे रखे थे। नोटबंदी के कारण वह बेचारा समय पर जुटा नहीं सका। दो-चार दिन ऊपर-नीचे हो गए उससे क्या बिगड़ा! सप्ताह-भर में तो मैंने रुपए जुटा लिए, पर किसी का मन बेईमान हो जाए तो कौन मालिक। मेरे एक लाख रुपए वह रोके बैठा है, उसकी कोई बात नहीं, पर वह लुगाई को वापस ले गया...। मैंने उसे जयनारायण वकील से मिला दिया। दसेक दिन बाद जयनारायण जी टकराए तो मैंने तुरत ही पूछा—वकील साहब, उस साटिए को अपने एक लाख रुपए वापस मिले क्या? जयनारायण जी ने जवाब दिया—रुपए किसे चाहिए थे? मैंने अचंभा जताया—तो क्या, उसे तो स्त्री चाहिए थी, वह उसे दिला दी, अब वह सोरा-सुखी है। मतलब, उसका सौदा पट गया? उन्होंने अच्छी तरह कहा तो मैंने मजाक करते कहा—वकील हैं, कोई चमत्कार किया होगा? तो उन्होंने सारी विगत बता डाली—मैंने सामने वाले व्यक्ति को नोटिस देकर कोर्ट में हाजिरी करवाई, फिर उसे हमारी भाषा में कई डर दिखाए, तब वह थोड़ा डरा और इसे गाली निकालते कहने लगा—धिक्कार है, साटिया होकर कोर्ट-कचेड़ी करता है, अपनी बात तो अपने दोनों के बीच या समाज में ही हो जानी चाहिए थी। फिर उसने मुझासे कहा कि वकील साहब, इसकी लुगाई मेरे से बीस बरस बड़ी है, कुछ पचासेक हजार रुपए और दिलवाओ तो सौदा करूं। यह आसानी से दो लाख की जगह अढ़ाई लाख देने को तैयार हो गया, इस तरह राजीपे में सौदा हो गया।'
मिश्राजी मुझासे कह रहे थे, 'इस तरह बाबूजी, यह नई पत्नी ले आया।'
मैंने मिश्राजी की ओर देखा। वे एक कठरूप-सी हंसी हंस रहे थे। कई देर तक प्रतिक्रिया में मुझो कोई शब्द नहीं सूझाा। बैंक में रहता हूं, रोजाना रुपए गिनने का काम करता हूं। रुपयों से गहरी पहचान है। ओह, रुपए मिर्च, नमक, अनाज खरीदने के काम ही नहीं आते, जीती-जागती स्त्री भी खरीदी जा सकती है। विचार करते-करते सीकर आ गया। मैं बैंक चला गया, मिश्राजी कोर्ट के सामने ही उतरते हैं।
बैंक में, मैं अभ्यासवश काम तो करता रहा, पर एक अजीब-सा उच्चाटन नामालूम दो स्त्रियों के प्रति हो रहा था। मुझो लग रहा था, दोनों ही स्त्रियों का सौदा ठीक नहीं हुआ। सायंकाल को आते वक्त भी मैं और मिश्राजी साथ ही आते हैं। आते वक्त मेरी सीट मिश्राजी रोके रखते हैं। वापस लौटते भीड़ थोड़ी बढ़ जाती है। मुझो नीचे खड़े देखकर मिश्राजी ने आवाज दी, 'आ जाओ गुप्ताजी।' दोनों समय सीट पर बैठकर जाना किसी उपलब्धि से कम नहीं होता। खटकी प्याऊ से निकलते ही आदत अनुसार मिश्राजी ने एक पाउच अपनी गलाफ के हवाले किया और मेरी तरफ मुड़कर कहा, 'और गुप्ताजी?'
'और तो ठीक है, पर यार मिश्राजी, सौदा ठीक नहीं हुआ।'
'कौन-सा सौदा?' फिर जैसे उन्हें स्मरण हुआ, 'हां, उस जस्से साटिए का कह रहे हो क्या?' मैंने कहा, 'हां भई, यह क्या सौदा हुआ?'
पीक थूक-थाककर उन्होंने बताना शुरू किया, 'गुप्ताजी, सौदा होने के दूसरे दिन यह जैसे मेरी प्रतीक्षा ही कर रहा था। देखते ही बोला—साहब, आपकी कृपा से सौदा हो गया, अब उदर-पूर्ति करता रहूंगा। मैंने कहा सौदे से उदर-पूर्ति का क्या संबंध है? वह थोड़ा रुंआसा हो गया, कंधे पर सो रहे बच्चे की ओर इंगित कर कहा—साहब, यह बच्चा अब दो साल से ऊपर होने को है, मेरी पुरानी लुगाई के बच्चे होने बंद हो गए, साहब वह मेरे से बीस बरस बड़ी है, पांच बच्चे उसके पहले पति से है, जिनको वह पीछे छोड़कर आई और पांच बच्चे मेरे होने के बाद उसकी माहवारी जाती रही। अगर नई लुगाई न लाऊं तो बच्चे कैसे हों और मेरे कंधे पर बच्चा न हो तो कौन मुझा पर दया करे। मुझे इस ढंग से मांगने के अलावा और कोई काम नहीं आता। अलसुबह बस स्टैंड पर आते ही मैं इस बच्चे को डोडा-पोस्त की चाय पिला देता हूं, छूंतरों के नशे में यह दिन-भर सोया रहता है, नींद में चंचेड़ कर मैं इसे दो-तीन दफा दूध पिलाता हूं और बिस्कुट खिलाता हूं। भरपेट खाना तो यह शाम को ही खाता है... पापी पेट के लिए ऐसा खोटा करम करना पड़ता है साहब। फिर कंधे पर सो रहे बच्चे के लिए उसके मन में थोड़ा प्रेम-सा जगा। उसके सिर पर हाथ फिराते उसने कहा—साहब, यह बच्चा थोड़े ही है, मेरा तो रुजगार है। रुपए तो ढाई लाख लगे, पर अब आगे दस-बारह बरसों की मुश्किल नहीं रहेगी...। अब बताओ गुप्ताजी, मैं उससे क्या कहता, मुझे पता है, आपके मन में बहुत सारी बातें चक्कर काट रही होंगी, लुगाई, बच्चा, अफीम के छूंतरे, रुजगार, पर हमारे वश में है ही क्या?'
मैं जैसे नींद से जागा और मरे-मरे से बोल मेरे मुंह से निकले, 'हां, हमारे वश में क्या है?'

Published on:
03 Jul 2018 04:37 pm
बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
