
राजस्थान में खिलाड़ियों की राह नहीं आसान, क्रीड़ा परिषद की अकादमी में प्रवेश का साल में मिलता एक ही मौका
देवेंद्र सिंह राठौड़ / जयपुर. प्रदेश के युवाओं में खेल के प्रति उत्साह तो बढ़ रहा है लेकिन उसे प्रदर्शित करने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पा रहा है। खिलाडिय़ों को क्रीड़ा परिषद की अकादमी में ( Sports council academy rajasthan ) प्रवेश के लिए भी कठिन रास्ते से गुजरना पड़ता है। एक खेल में दो दिन कठिन प्रक्रिया होती है। इसमें खिलाड़ी को हुनर दिखाने का मौका मिलता है। इसमें पहले रजिस्ट्रेशन, मेडिकल जांच, शाम को बैट्री टेस्ट और अगले दिन सुबह स्किल टेस्ट होता है। इन्हीं के आधार पर चयन होता है। इसमें चूके तो मौका अगले साल ही मिलता है।
ऐसे में कई बार दक्ष खिलाड़ी भी अति उत्साह के चलते कमजोर साबित हो जाता है। फिर उसे अगले साल ही मौका मिलता है। जबकि देश की अन्य अकेडमी में खेल कौशल या प्रदर्शन दिखाने का चार से पांच दिन मौका दिया जाता। गत दिनों हुए ट्रायल में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले है।
बुलाया लेकिन खिलाया नहीं
सूत्रों के मुताबिक इस साल जनवरी के तीसरे सप्ताह में सीनियर बास्केटबॉल की टीम के लिए जयपुर में 7 खिलाडिय़ों को बुलाया गया। जब तक लगभग बास्केटबॉल खेल की गतिविधियां समाप्त हो चुकी थीं। तीन महीने तक इन खिलाडिय़ों ने कोई टूर्नामेंट नहीं खेला और जुलाई मेें आए खिलाडिय़ों की भांति सुविधाओं का लाभ उठाते रहे। हालात ये हैं कि ज्यादातर खिलाडिय़ों ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन ही नहीं किया।
इतना अंतराल क्यों
क्रीड़ा परिषद् की अकादमी अमूमन जुलाई से अप्रेल तक संचालित होती है। मई-जून में बंद हो जाती है। इसमें दो महीने तक का लम्बा अंतराल देखा जाता है। जबकि देश की प्रमुख अकादमियों में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। खेल प्रशिक्षकों का कहना है कि मई और जून में देश की ज्यादातर अकादमी में ऑफ सीजन ट्रेनिंग होती है। ज्यादा फोकस इंडोरेंस व स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर होता है। जबकि इन अकादमी के खिलाड़ी जुलाई और अगस्त में सीधे टूर्नामेंट खेलना शुरू कर देते है।
स्टेट चैंपियनशिप पर गुमान
खेल विशेषज्ञों की मानें तो जैसलमेर में आयोजित बास्केटबॉल अकादमी के अलावा अन्य संचालित अकादमियों में नेशनल स्तर का प्रदर्शन नहीं देखा गया। स्टेट लेवल प्रदर्शन को पर ही परिषद को गुमान है। यह भी कारण है कि खिलाडिय़ों को बाहर खेलने के अवसर कम मिलते हैं। ज्यादातर स्कूल टूर्नामेंट-ओपन टूर्नामेंट ही खेल पाते हैं। खिलाडिय़ों को एक्सपोजर भी दिया जाना चाहिए।
यह कैसा नियम हर साल होता ट्रायल
हैरत की बात है कि खिलाडिय़ों को केवल दस महीने का ही प्रशिक्षण मिलता है। इसमें फरवरी-मार्च में परीक्षाएं रहती हैं। कई बार मौसम की भी मार पड़ती है। छह-सात महीने के प्रशिक्षण के बाद जब वे तैयार होने लगते हैं तो दोबारा ट्रायल आ जाते हैं। दक्षता पाने के बाद उन्हें फिर मौका मिल जाता है लेकिन नए खिलाडिय़ों का कम मौका मिलता है। ऐसे में जितने आवश्यक हों, उतने ही पदों पर ट्रायल होना चाहिए।
यह है बानगी :
झोटवाड़ा निवासी राजवीर ने बताया कि मैंने सवाईमान सिंह स्टेडियम में बॉलीबाल को लेकर ट्रायल दिया था लेकिन उसमें फेल हो गया। अब एक साल इंतजार करने के सिवाय कोई चारा नहीं है। अगले साल दोबारा दूंगा।
Published on:
24 Jun 2019 02:10 pm
बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
