
इनका जीवन रैन बसेरा
कहानी
डॉ.श्रीगोपाल काबरा
जयपुर की पॉश लोकेलिटी मालवीय नगर। हमारे घर के सामने एक प्लॉट खाली पड़ा था। उसमें बबूल, खेजड़ी, बेर और नीम के पुराने घने पेड़ थे। उन पेड़ों पर शाम को रैन बसेरा करने खूब पक्षी आते थे- गौरया, बुलबुल, मैना आदि। शाम उनकी चहचहाट से गुलजार हो उठती थी। भोर होते ही नीड़ छोड़ जाते पक्षी, ठीक वैसे ही जैसे पास के स्कूल में आते जाते चहकते बच्चे। घनी झााडिय़ों में तीतर के जोड़े अपनी बुलंद आवाज में 'पटीला! पटीला!!' पुकारते। सवेरे चाय पीते इन्हें देखना बड़ा अच्छा लगता था। प्लाट की मुंडेर पर लाइन बना कर चलते तीतर - 'तीतर के दो आगे तीतर तीतर के दो पीछे तीतर, बतलाओ तो कितने तीतर?' याद आते। दिन भर पक्षियों की आवाजाही रहती। कुहकती कोयल। सुनहरे रंग का बांसुरी बजाता पीलक। बच्चे देख कर खुश होते। फुगनी पर बैठा किल-किल की लंबी तान छेड़ता नीला भूरा किलकिला। तिकोने लाल तुर्रा वाला तने की छाल से कीड़े चुनता कठफोड़ुआ। झारबेरी की झाड़ी पर जब बेर आते बच्चे दीवार फांद कर लूमे रहते। मुझो अपना बचपन याद आता। भाभी याद आती जो पैसे दे कर चुपके से कच्चे बेर मंगवाती थी।
वहां पर बयाओं का आगमन आश्चर्य की बात थी। पहले तो उन्हें पहचाना ही नहीं गया। लेकिन जब उन्होंने तिनके चुन-चुन कर घोंसले बनाने शुरू किए तो उनके पीले रंग से पहचाना कि वे गौरया से भिन्न हैं। पतली डाली से झाूलते घोंसले।
घोंसले तैयार हो गए तो एक दिन देखा बयाओं का झाुंड आया हुआ था। घर की मुंडेरों, पेड़ों की डालियों पर चहकती बयाएं। एक एक कर बया जाती, घोंसला देखती, अंदर जाती और फिर उड़ कर झाुंड में आ जाती, चहकती, बतियाती। मनोरम दृश्य था। मैंने बताया, 'जानते हो घोंसला नर बया बनाता है। फिर यह अजब सा स्वयंवर रचता है। नर, मादा बया को रिझााता है। जो मादा घर देख कर रीझा जाती है........'
बीच में बात काटते हुए उसकी तल्ख टिप्पणी 'रिझााना रीझाना माई फुट! साफ है पक्षियों में भी दहेज प्रथा होती है, बोली लगती है।'
खैर, फिर बया कभी नहीं आई। घोंसले खाली लटके रहे।
वैसे प्लॉट का झााड़ झांकार प्लॉट के पास घर वालों को अखरता भी था। एक साहब ने मुंडेर के पास वाले घने पेड़ को इसलिए छंटवा दिया कि पक्षी उनकी कार पर बींट करते थे। प्लॉट के पीछे घर वाले ने पेड़ को इसलिए कटवा दिया कि उनके घर में पेड़ के कारण अंधेरा हो रहा था। प्लॉट से लगे घर वाले ने इसलिए काट डाला कि पेड़ इतना ऊंचा हो गया था कि कोई चढ़ कर उनके घर में आ सकता था। आखिर वही हुआ जो होना था। प्लॉट के मालिक ने घर बनाना शुरू किया। जिस रोज पेड़ काटे गए रैन बसेरा के लिए आए पक्षी उन धाराशायी पेड़ों पर बैठे। फिर नहीं आए।
मकान बन रहा है, किसी सेठ का। चेजे का काम चल रहा है। पक्षियों के स्थान पर कामगार, उनके बच्चे। कामगार, चेजारे दूर दराज से आए हुए हैं। दूर से आए ये कंस्ट्रक्शन वर्कर्स ठकेदारों की पहली पसंद होते हैं। पूरा परिवार होता है। सारे दिन यहीं रहते हैं और काम करते हैं। एक पोटली में पूरा गृहस्थी का सामान होता है। आसपास से बीन कर लकड़ी की खपच्चियों की झाोंपड़ी बनाते हैं और बच्चों के साथ रहते हैं। तीन ईंट का चूल्हा, बीनी हुई लकडिय़ां से आग, तसले में आटा सानकर रोटी, मिट्टी के टूटे घड़े के पैंदे का तवा। औरतें अल सुबह उठ कर खाना बनाती हैं, बच्चों को खिलाती हैं और फिर काम के लिए तैयार। मर्द चेजे का काम करते हैं, महिलाएं ईंट, मिट्टी, गिट्टी आदि ढोने का काम।
हम घर के बाहर निकले तब दुपहर को खाने की छुट्टी हुई थी। सामने बैठी एक मजदूर महिला अपने नवजात बच्चे को दूध पिला रही थी। पास ही गिट्टी के ढेर पर बैठा उसका एक डेढ साल का बच्चा रोटी का टुकड़ा चबा रहा था। पास ही में उसकी चार पांच साल की बहन अपने में मगन पत्थरों से खेल रही थी। एक और मजदूर महिला, जो पेट से थी, अपने पति के साथ रोटी खा रही थी। हथेली पर रोटी, उस पर रखा सालन और प्याज जो अभी तोड़ कर उसके मर्द ने दिया था। जिस स्वाद से वे खा रही थी देख कर ही मुंह में पानी आ रहा था।
घर से निकलते मैंने कहा, 'हर प्रेग्नेन्ट महिला को 6 महीने के सवेतन अवकाश का कानूनी प्रावधान है। वेलफेयर स्टेट और सिविल सोसाइटी का यह प्रावधान है। कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए कार्यस्थल पर पालना घर मुहैया करवाना भी अनिवार्य है। महिला संगठन और सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन महिलाओं को देखो, इनके लिए.......'
मेरा कहा पूरा होता उसके पहले ही अहंकार भरी टिप्पणी, 'ये गंवार औरतें हर साल बच्चे जनेंगी तो सरकार क्या करेगी? महिला संगठन क्या करेंगे?'
मजदूर महिला स्तनपान करवा कर बच्चे को एक बल्ली से बंधे चुन्नी के झाूले में सुला रही थी। गर्भवती मजदूर महिला के पति ने उसके सिर पर ईंटों से भरी तगारी उठवा दी थी। मेहनत, संतोष, आत्मविश्वास। उनमें कोई हीन भावना नहीं थी।
Published on:
18 Aug 2020 12:15 pm
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