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बगिया का माली

लक्ष्य ऐसा बनाओ जो स्वयं अपने पैरों पर खड़े हो, दूसरों को आश्रय दे सको। फूल बन खिलने से तो कहीं ज्यादा आनंद माली बनने में है। मिश्राजी मुस्कुरा उठे। यही वाक्य एक दिन उन्होंने मोंटू को प्रेरित करने के लिए कहा था।

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बगिया का माली

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कहानी
पयोनिधि कासलीवाल

पंडित रघुनाथ मिश्रा अपने मोहल्ले के सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेड मास्टर हैं। मोहल्ले में अच्छी पहचान और एक इज्जत थी। कई पीढिय़ों से उनका परिवार वहीं जो रह रहा था और काम भी पढ़ाने - लिखाने का था। जाने कितने बच्चे उस मोहल्ल के उनके हाथों बेंत खा आज जीवन में कुछ करने लायक बन निकले थे। बहुत खुशी होती थी मिश्राजी को जब उनमें से कोई बच्चा मिठाई लेकर आता और बताता था कि वह अच्छी नौकरी पा गया है।

एक दिन की बात है, दोपहर का वक्त था, भीनी-भीनी बारिश की फुहार आ रही थी। मिश्रा जी अपने घर के बरामदे में बैठे थे कि भीतर से मिश्रायिन जी की आवाज आई - 'सुनते हो मोंटू का फोन आया था, कह रहा था कि वह आज मिलने आएगा।' मिश्रा जी ने 'हूं' किया।

पत्नी की बात सुनकर, स्मृति जागने लगी। मोंटू पड़ोस वाले विष्णु कान्त सक्सेना, रिटायर्ड गेजेटेड अधिकारी का बेटा बेहद शैतान था। अक्सर मिश्रा जी के बगीचे में से आम और अमरूद चुरा लेता। मिश्राजी के बेटे दीपक का हम उम्र रहा होगा, पर दीपक से उसकी कभी न बनी।
परीक्षाओं के दिन थे, शायद 10वीं बोर्ड की रही होंगी। दीपक भी तैयारी कर रहा था और मिश्राजी तो अपने स्कूल के कार्य को लेकर व्यस्त थे। ऐसे में मोंटू उनके घर आया और दीपक से आग्रह करने लगा कि उसको भी तैयारी करवा दे। दीपक ने टाल दिया कि उसका रिविजन तो अभी बहुत बाकी है। कुछ एक सप्ताह बीता होगा कि एक दिन सुबह सवेरे मिश्राजी, विष्णु कान्त सक्सेना साहब के घर पहुंच गए। मिश्राजी बोले - 'सक्सेना साहब, एतराज न हो, तो मोंटू को अगली बोर्ड परीक्षा के लिए तैयारी मैं करवा दूं। थोड़ा समय निकाल लूंगा।'
विष्णु कान्त विनम्रता पूर्वक बोले - 'यह तो आपका उपकार होगा। आप तो जानते हैं वह तो बस खेल-कूद में लगा रहता है, क्या पढ़ पाएगा?' मिश्राजी ने कहा - मोंटू मेरे बेटे समान है। फीस तो गैरों से ली जाती है। यह कह कर मिश्राजी उठ खड़े हुए और अगले दिन से मोंटू को पढऩे के लिए भेजने को कह गए।
इस प्रकार मोंटू को दीपक ने नहीं, मिश्राजी ने निस्वार्थ पढाया। दो वर्षों तक तैयारी करवाई और मोंटू ने चमत्कार कर दिखलाया। वह फस्र्ट डिविजन में अच्छे नम्बरों से पास हो गया। और फिर मोंटू को कहीं विदेश में पढऩे भेज दिया गया।

कुछ वर्ष बीत गए। सक्सेना साहब से कभी बाहर मुलाकात हो जाती तो मिश्राजी पूछ लिया करते कि मोंटू कैसा है? पता लगा कि विदेश में सेटल हो गया है। मिश्राजी ने भी दीपक के बारे में बताया कि वह भी सरकारी यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हो गया है। देहरादून में है, अपने परिवार संग रहता है। यह सब बातें सोचते-सोचते मिश्राजी की कुर्सी पर ही आंख लग गई।

अचानक किसी ने उनके पांव छुए तो एक दम हड़बड़ा कर उठते हुए मिश्राजी ने देखा कि एक सुंदर सी युवती उनकी गिरी हुई पुस्तक को सादर उठाकर सामने खाली मेज पर रख रही है। सामने हाथ जोड़े मोंटू झाुक कर प्रणाम की मुद्रा में खड़ा है। मोंटू बोल पड़ा - प्रणाम मास्टरजी, यह मेरी पत्नी शुचिता है और मैं मोंटू, पहचाना आपने?' मिश्राजी अभिवादन स्वीकार कर उठ खड़े हुए और पत्नी को आवाज लगाई फिर स्नेह से दोनों को कन्धों से पकड़ कर बगल की कुर्सियों पर बिठलाया।
मोंटू - मास्टर जी। बहुत वर्ष हो गए। आपने मुझो हाई स्कूल तो अव्वल दर्जे में पास करा दिया था, उसके बाद मैं अमरीका पढऩे चला गया और वहां मैकेनिकल इंजिनियरिंग में स्नातक किया। फिर पोस्ट ्रग्रेजुएट कर पांच साल तक एक रोबोटिक्स कम्पनी में काम किया। और गत 4 वर्षों से मैंने वहां अपनी फैक्ट्री लगा ली है, रोबोट निर्माण की।' यह कह कर मोंटू ने अपना बिजनेस कार्ड मिश्राजी के हाथ में दिया।
मिश्राजी की आंखें फटी रह गईं। लिखा था - मैनेजिंग डायरेक्टर, रघुनाथ रोबोटिक्स इंडस्ट्रीज, सेन फ्रांसिस्को,अमरीका।

मिश्राजी समझ गए कि उनके नाम पर मोंटू ने उसकी कम्पनी का नाम रख उनके सपने को पूरा किया था। अपनी धोती के छोर से नम आंखों को पोछते हुए बोले - सच है पुरुषार्थ की कोई पराकाष्ठा नहीं होती। धन्य हो मेरे बेटे। इसी बीच शुचिता बोली - मास्टर साहब, और बताऊं ये रोबोटिक्स की रोजाना ऑनलाइन क्लास लेते हंै, इंजिनियरिंग के विद्यार्थियों के लिए। बिल्कुल फ्री पढ़ाते हैं। और कहते हैं कि - लक्ष्य ऐसा बनाओ जो स्वयं अपने पैरों पर खड़े हो, दूसरों को आश्रय दे सको। फूल बन खिलने से तो कहीं ज्यादा आनंद माली बनने में है। मिश्राजी मुस्कुरा उठे। यही वाक्य एक दिन उन्होंने मोंटू को प्रेरित करने के लिए कहा था।