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Jaswant Singh: वाजपेयी दरबार के रत्न रहे जसवंत सिंह की कहानी, जानिए जसोल गांव से दिल्ली तक का सफर

Jaswant Singh Birth Anniversary: जसोल गांव से देश की सत्ता के केंद्र तक पहुंचने वाले जसवंत सिंह का जीवन राजनीति, कूटनीति और साहसिक फैसलों से भरा रहा। सेना से राजनीति तक का उनका सफर उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सबसे भरोसेमंद स्तंभों में शामिल करता है।

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जसवंत सिंह। फाइल फोटो- पत्रिका

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह का जन्म 3 जनवरी 1938 को राजस्थान के बाड़मेर जिले के जसोल गांव में हुआ था। वे ठाकुर सरदारा सिंह और कुंवर बाईसा के पुत्र थे। सादगी और अनुशासन उनके जीवन की पहचान रहे। उन्होंने अजमेर के प्रतिष्ठित मेयो कॉलेज से बीए और बीएससी की पढ़ाई की और इसके बाद भारतीय सेना में रहे। फिर उन्होंने राजनीति का रुख किया।

जसवंत सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत को दिया जाता है, जिन्होंने उन्हें जनसंघ से जोड़ा। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की नींव पड़ी। 1980 के दशक में वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए और जल्द ही भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी करीबी पूरे राजनीतिक गलियारों में चर्चित रही।

अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली

जब वाजपेयी 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने, तब जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया। इसके बाद 1998 से 2004 के बीच वाजपेयी सरकार में उन्होंने वित्त, रक्षा और विदेश जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौर में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे। 2004 से 2009 तक वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे।

साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट के अपहरण और कंधार संकट के दौरान जसवंत सिंह की भूमिका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही। यात्रियों की रिहाई के लिए वे स्वयं अफगानिस्तान के कंधार गए थे। इस निर्णय को लेकर उनकी आलोचना भी हुई।

विवादों में घिरे

जसवंत सिंह अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस’ को लेकर भी विवादों में घिरे। इस किताब में उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की थी। पुस्तक में उनके विचारों के चलते भाजपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था, हालांकि बाद में वे फिर पार्टी में लौट आए। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बाड़मेर सीट से टिकट नहीं दिया, जिससे आहत होकर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा। इस फैसले के बाद पार्टी ने उन्हें फिर बाहर का रास्ता दिखाया और वे चुनाव भी हार गए।

सर्वश्रेष्ठ सांसद का मिला सम्मान

2012 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया। उस समय तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने भी उनके समर्थन का ऐलान किया था, लेकिन वे यूपीए उम्मीदवार मोहम्मद हामिद अंसारी से चुनाव हार गए। जसवंत सिंह को 2001 में सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से नवाजा गया था। उनकी सलाह पर ही जुलाई 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को आगरा शिखर वार्ता के लिए आमंत्रित किया था, हालांकि वार्ता किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी।

मई 2014 में जसवंत सिंह जसोल से दिल्ली गए थे। अगस्त 2014 में घर में गिरने से उनके सिर में गंभीर चोट आई, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के सेना अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद वे लंबे समय तक कोमा में रहे और करीब छह साल तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते रहे। अंततः 27 सितंबर 2020 को उनका निधन हो गया। जसवंत सिंह का जीवन राजनीति, राष्ट्रसेवा और वैचारिक दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है।