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हवेली

मुझे इन चित्रों को बनाने वाले चित्रकार का नाम मिला है, लिखा है-उस्मान गनी। एक मुसलमान चित्रकार ने हिंदू पौराणिक अवतारों के कितने सुंदर चित्र बनाए। रवीन्द्र ने मेरे पास आते हुए कहा- भइया, मुझे तो अपनी हवेली से प्यार हो गया है।

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हवेली

हवेली

कहानी

चेतन स्वामी

हमारा घर एक बड़ी हवेली है। चित्रों से सजी हुई। दादाजी ने शौक से बनवाया था। कहा करते थे, बेटे-पोतों को रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी। ऊंची छतों वाले बड़े-बड़े कमरे। गोखेनुमा खिड़कियां। प्रात:काल की ठंडी हवा खानी हो तो पैर पसार कर बैठ जाओ। हम दोनों भाइयों का बचपन यहीं गुजरा।
मैं सत्रह पार नहीं कर पाया और रवीन्द्र तो अभी तेरह ही वर्ष का था। हमारे घर पर वज्राघात हुआ। सिलीगुड़ी में दम घुटने से पिताजी की मौत हो गई। पाट के गोदाम में उनका दम घुट गया, पाट की बड़ी बड़ी गांठें उन पर आ पड़ी। वे गोदाम में अकेले थे। सिलीगुड़ी में हमारा पाट का व्यवसाय था। मुनीमों के हवाले व्यवसाय को बाद में मामाजी ने संभाला।
कुछ ही दिनों बाद हवेली में किराएदार रखकर हमारे परिवार को सिलीगुड़ी जाना पड़ा। हमारा व्यवसाय मामाजी और मुनीमों पर टिका हुआ था। मामाजी के आग्रह पर मैंने वहीं से बी कॉम तक अध्ययन किया और अपने पैतृक व्यवसाय में लग गया। वहीं मारवाड़ी स्व जातीय परिवार में मेरा विवाह हो गया। वे लोग कलकत्ता रहते थे। व्यवसाय के सिलसिले में मुझो अक्सर ही कलकत्ता जाना पड़ता। जूट मिलों में चक्कर काटते काटते मैं परेशान हो जाया करता,पर मेरे व्यवसाय की प्रकृति ही ऐसी थी। छोटे भाई रवींद्र की हमारे पैतृक व्यवसाय में तनिक भी रुचि नहीं थी। उसने सैकण्ड्री करते समय ही मुझे स्पष्ट कह दिया-'भइया, मैं तो मेडिकल लाइन में जाऊंगा, मैं अब आगे साइंस लूंगा।' वह बायोलॉजी से सीनियर करने के बाद मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी में जुट गया। पहले वर्ष वह मैरिट में पीछे रह गया, अगले वर्ष उसे एमबीबीएस में तो नहीं पर बीडीएस के लिए टॉप रैंक में प्रवेश मिल गया। उसने कलकत्ता से बीडीएस करना प्रारंभ कर दिया। फिर पीजी के आखरी वर्ष में उसके एक शिक्षक ने अपनी दंत क्लिनिक में उसे पार्ट टाइम जॉब के लिए रख भी लिया। उसके हाथों में दक्षता और मन में आत्मविश्वास जमने लगा।
पीजी कम्प्लीट होने की प्रतीक्षा में हम रवीन्द्र का विवाह टाले जा रहे थे। संयोग से जिस लड़की को हमने रवीन्द्र के लिए पसंद किया, उसके पिता कलकत्ता में व्यवसाय करते हैं, किन्तु मूलत: वे हमारे ही कस्बे के रहने वाले हैं। समधि जी ने जोर दिया कि विवाह देश में करें तो सुविधा रहे। यह प्रस्ताव मां को भी अच्छा लगा। मां कहने लगीं 'तेरह-चौदह वर्षों से हमारी इतनी अच्छी हवेली किराएदारों के हवाले है, इस बहाने दो चार महीने खुद की हवेली में रहने का सुख मिलेगा।'
सोचा अच्छा ही तो है, इस बहाने पुरखों की हवेली के रंग रोगन, मरम्मत आदि हो जाएगी। मेरे दोनों बच्चे तो पहली दफा देश जाएंगे और मेरी पत्नी दूसरी दफा। पांच वर्ष पहले पति-पत्नी जयपुर किसी निकट रिश्तेदार के विवाह में गए थे, तब केवल डेढ दिन हवेली में रुके थे। रवीन्द्र के विवाह की तैयारी के सिलसिले में विवाह तिथि से दो माह पहले ही मैं मां को लेकर आ गया। विवाह से दस दिन पहले रवीन्द्र को बच्चों को लेकर आने का बोल दिया।
मां ने हवेली का एक एक काम इतनी कुशलता से करवाया कि वह एक बार नई जैसी हो गई। अपनी ही हवेली पर मैं मुग्ध हो गया। इसमें कई रिश्तेदारों को आसानी से ठहराया जा सकता है।
होली के चार दिन पहले विवाह की तिथि थी। दस दिन पहले रवीन्द्र, बच्चे और पत्नी के आ जाने से तथा कुछ निकट रिश्तेदारों की आवाजाही से हवेली में बचपन वाली रौनक लौट आई। कुछ मेरे मित्रों को मैंने आमंत्रित किया, जिनसे मैं तेरह-चौदह वर्ष बाद मिल रहा था। मेरी पत्नी और बच्चों को तो इस खुले माहौल में बहुत अच्छा लग रहा था। बच्चे, हवेली के चौक, लंबी चौड़ी छत और हवेली से लगते नोहरे में धमा चौकड़ी मचाते थकते नहीं। विवाह के दिन नजदीक आते-आते तो हवेली में और अधिक गहमा-गहमी बढ गई। रवीन्द्र को देशी रस्मों के साथ विवाह कराना बहुत अच्छा लगा। उसकी पत्नी तो इसी कस्बे के माहौल में पली बढी है, तब उसके लिए कुछ नया नहीं था। विवाह धूमधाम से हुआ। विवाह के चार दिन बाद होली का त्योहार आ गया। होली की पहली रात हवेली में धमाल का कार्यक्रम रखा गया। बच्चों के लिए यह एकदम नया अनुभव था। होली के एक सप्ताह बाद ही हमें लौटना था। इसी बीच लॉकडाउन की घोषणा होने से हमें यहीं टिकना पड़ा।
एक दो रोज तो चिंता में व्यतीत हुए। फिर हम लोग अपनी लंबी चौड़ी हवेली के चित्रों पर शोध करने लगे। कभी भी अपनी ही हवेली की इस पेंटिंग को इतने गौर से नहीं देखा। तीन चार रोज पहले रवीन्द्र ने बड़े आश्चर्य जताते हुए मुझसे कहा- 'भइया, मुझे इन चित्रों को बनाने वाले चित्रकार का नाम मिला है-लिखा है-उस्मान गनी। एक मुसलमान चित्रकार ने हिंदू पौराणिक अवतारों के कितने सुंदर चित्र बनाए। उसे हमारी मायथोलॉजी की कितनी जानकारी रही होगी?'
रवीन्द्र ने मेरे पास आते हुए कहा-'भइया, मुझे तो अपनी हवेली से प्यार हो गया है। अब मैं तो अपना डेंटल क्लिनिक इसी कस्बे में खोलूंगा और रोज शाम अपनी इस प्यारी हवेली में आ जाया करूंगा।'
उसके इस निर्णय से मां को भी बहुत प्रसन्नता हुई।